खंड 2: प्रकृति का पुनर्जागरण और सृष्टि का संकल्प
2.1: ज्ञान-शक्ति का संदेश
प्रभु की ज्ञान-शक्ति ने
क्रिया-शक्ति को पुनः जगाया,
और इच्छा-शक्ति तक
अपना संदेश पहुँचाया।
यह जान प्रकृति मुस्कुरा उठी,
प्रभु का संकल्प दोहरा उठी,
इस सृष्टि को आगे बढ़ना होगा।
2.2: शिव का सांसारिक होना
राम के ही आकर्षण के कर्षण से
शिव को सांसारिक बनना होगा।
राम में तो सब रमते हैं,
फिर राम के आकर्षण से
शिव सांसारिक कैसे होंगे?
ज्ञान-शक्ति और क्रिया-शक्ति
इस सोच से जितनी जड़ हुई,
इच्छा-शक्ति हो उतनी ही चेतन।
प्रकृति के भृकुटि-कटाक्ष का
एकाग्र हो करने लगी अनुशरण।
2.3: पुरुष और प्रकृति को पृथक करने का विचार
प्रकृति का भृकुटि-कटाक्ष पा,
राम ने कमलनयन खोले,
और मुस्कुराते हुए भगवान्
शिव के हृदय से ही बोले—
“आइए, भगवती सीता!
आप भी आइए!!
शिव में ही हमारा वास है,
आप भी यहीं बस जाइए।”
भगवती सीता मुस्कुरा उठीं—
“मैं तो सदैव आपके हृदय में हूँ,
सीता सदैव राम के हृदय में रहेगी।
पर आज सृष्टि संकल्प के हित,
हम दोनों को एक अलग तरह से
अपनी सृष्टि में चलना होगा।
मुझे और आपको भी
एक नया रूप धारण करना होगा। कू
टस्थ आदिपुरुष और आदि प्रकृति
दोनों को अलग-अलग होकर,
भव में अनेक भावों का
आकर्षण जागृत करना होगा।
इसके लिए प्रकृति को अब पुरुष से
पृथक होकर अपनी राह चलना होगा।”
2.4: पुरुष और प्रकृति का पार्थक्य और राधा-कृष्ण का उद्भव
प्रभु की सम्मति मिलते ही,
आदि प्रकृति धीरे-धीरे,
मधुर मुस्कान लिए,
उनके हृदय से
शांत गति से दूर होने लगीं।
प्रभु की दृष्टि, जो अब तक—
(क्योंकि अब यह राम-रूप रहा ही कहाँ)—
गंभीर और स्थिर थी,
अचानक चंचल हो उठी,
चारों दिशाओं में उन्हें खोजने लगी।
स्मृतियों की गूंज भीतर ही दब गई—
जहाँ कभी प्रकृति का वास था, वहाँ अब
(राम की ही तरह, अब वे सीता भी कहाँ थीं!)
एक दिव्य विरह का चिरंतन अनुभव था।
वे विशाल कमलनयन, जिनमें
पूर्णकाम और परमविराम बसा था,
अब एक चिरंतन विरह-वेदना का
नया आयाम बन चुका था।
सृष्टि को उसके परम आयाम तक ले जाने हेतु,
राम आधे-आधे हो गए, विभक्त होकर,
सृष्टि के लिए कृष्ण बने,
और कृष्ण के लिए राधा हो गए।
जो कभी एकात्मक थे सीताराम,
अब बने युगलात्मक राधाश्याम,
यही वह शाश्वत प्रेम है, जो है आत्मा का आधार,
जिसमें समाहित है संपूर्ण सृष्टि के होने का सार।