शिव की परमानंदमय लीनता | कैवल्य

खंड 4: शिव की परमानंदमय लीनता

4.1: राम में शिव का एकात्म भाव

आप निराकार हैं,
फिर भी मेरे भीतर
साकार होकर प्रकट हुए।
आप ही सब कुछ हैं,
आप ही मेरे प्रश्न का उत्तर हैं।
अब न मैं रहा,
न मेरा “मैं कौन हूँ?”
बस आप ही शेष हैं —
शिव रूप में, रम भाव में,
प्रेम में, प्रकाश में,
अनाहत नाद में।

4.2: नामरस और रूप-समुद्र में गोते

आपकेरूपसमुद्र में
मन डूबा जा रहा है।
अब कहाँ कुछ अपने बस में है,
सब कुछ तो आपके
नाम के रस में है।
मुझेइस नामरस को
जी भर कर पीने दीजिए,
इस रूप के समुद्र में
गोते लगाते हुए जीने दीजिए।

4.3: प्रेमाश्रु और राम-नाम का ध्यान

इतनाकहकर शिव,
परमानंद से भरने लगे,
हृदय रुद्ध हो गया,
नेत्रों से प्रेमाश्रु झरने लगे।
जिह्वापर फिर राम-नाम आया,
साँसों में वही अनाहत नाद समाया।
शिव की आँखें मुँद गईं,
वे राम में फिर रम गए,
वे राम में ही रम गए।