शिव में राम के नए रूप का उदय | कैवल्य

खंड 7: शिव में राम के नए रूप का उदय

7.1: देवी का आग्रह और प्रभु की प्रकृति

प्रभुबोले, हे देवी!
मैं और आप
अलग कहाँ हैं?
आप तो सदैव
वास करती हैं
मेरे हृदय में।
इसबार प्रभु की
प्रकृति दिख पड़ी —
आगत, अनागत,
भूत, अनाभूत,
भवितव्य, अभवितव्य —
सभी सृष्टियों का
संपूर्ण विलास लिए,
प्रभु के पार्श्व में खड़ी।

7.2: शिव के हृदय में राम का नया रूप गढ़ना

वे पुनः बोली—
“अगर इन्हें आपके भाव को लिए
आगे बढ़ना होगा,
तो हे प्रभु,
आपको भी इनके हृदय में
अपना एक नया रूप
गढ़ना होगा।”

7.3: प्रभु का अंतर्ध्यान और शिव की व्याकुलता

यह प्रभु की प्रकृति,
उनकी क्रियाशक्ति,
इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति —
सभी की यही तो मूल हैं।
इनके बिना तो स्वयं
प्रभु भी स्थूल हैं।
देवीका भ्रुकुटि कटाक्ष पा,
प्रभु शिव के हृदय से
निकल अन्तर्ध्यान हो गए।
शिव के सभी अनुभव—
शूल सम और विषम वाण हो गए।
प्रभुको ढूँढ़ते हुए विकल हो
शिवअपने ध्यान से जगे।
प्रभुको ढूँढ़ते उनके
नेत्रोंसे अश्रु झरने लगे।