खंड 1: आदि चैतन्य और प्रथम स्पंदन
1.1: निर्विकार का उदय
जब कुछ भी नहीं था,
न स्थान, न समय,
न रूप, न नाम,
था वह चैतन्य निर्विकार,
निराकार और अनादि था।
1.2: सृष्टि की चाह और साकार रूप का प्राकट्य
उस चैतन्य के भीतर
जगी थी एक चाह —
सृष्टि को प्रकट करने की।
उस परम चैतन्य की चाह से
एक दिव्य साकार रूप प्रकट हुआ।
1.3: अस्तित्व का प्रश्न: “मैं कौन हूँ?”
उस रूप को नहीं थी अपनी कोई पहचान,
था तो बस अपने अस्तित्व की
स्वयं में ही खोई एक अनुभूति,
और एक अनुत्तरित प्रश्न —
“मैं कौन हूँ?”