कैवल्य का परम सत्य | कैवल्य

खंड 8: कैवल्य का परम सत्य 8.1: शिव-राम एकात्म का दर्शन प्रकृति ने कहा — “हे प्रभु!अब उस समय को लाना ही होगा,शिव को उनके हृदय में जगाना ही होगा.”प्रभु भव-भाव में आए,प्रकृति की क्रियाशक्ति उनमें समाई.शिव ने कहा — “हे राम!आप मेरे हृदय में क्यों नहीं आते?”प्रभु ने कहा — “हे भोलेनाथ!मुझमें और आपमें … Read more

शिव में राम के नए रूप का उदय | कैवल्य

खंड 7: शिव में राम के नए रूप का उदय 7.1: देवी का आग्रह और प्रभु की प्रकृति प्रभुबोले, हे देवी!मैं और आपअलग कहाँ हैं?आप तो सदैववास करती हैंमेरे हृदय में।इसबार प्रभु कीप्रकृति दिख पड़ी —आगत, अनागत,भूत, अनाभूत,भवितव्य, अभवितव्य —सभी सृष्टियों कासंपूर्ण विलास लिए,प्रभु के पार्श्व में खड़ी। 7.2: शिव के हृदय में राम का … Read more

प्रकृति का इंगित और शिव का महत्व | कैवल्य

खंड 6: प्रकृति का इंगित और शिव का महत्व 6.1: प्रभु और प्रकृति का संवाद यह इंगित पाते ही मानो,प्रभु की प्रकृति मुस्कुराई,और वह मुस्कान अनायास हीप्रभु के अधरों पर भी आई।अपनीप्रकृति को इंगित करप्रभु स्वयं से ही बोले —“मेरे भक्त काल हैं,और यही हैं महाकाल भी।पर क्या इनका इतना सापरिचय पूरा है?इनके बिना तो … Read more

राम की भक्ति और सृष्टि का संकल्प | कैवल्य

खंड 5: राम की भक्ति और सृष्टि का संकल्प 5.1: कल्पों तक का विश्राम फिर क्या था —फिर क्षण बीते,फिर प्रहर बीते,फिर दिन बीते,फिर मास बीते,फिर वर्ष बीते,फिर युग बीते,और इस बार तोअनेक कल्प भी बीते… 5.2: प्रभु राम का भोले भक्त में लीन होना प्रभु राम भी,अपने इस भोले भक्त में,भोलेपन की उस निष्कलुष … Read more

शिव की परमानंदमय लीनता | कैवल्य

खंड 4: शिव की परमानंदमय लीनता 4.1: राम में शिव का एकात्म भाव आप निराकार हैं,फिर भी मेरे भीतरसाकार होकर प्रकट हुए।आप ही सब कुछ हैं,आप ही मेरे प्रश्न का उत्तर हैं।अब न मैं रहा,न मेरा “मैं कौन हूँ?”बस आप ही शेष हैं —शिव रूप में, रम भाव में,प्रेम में, प्रकाश में,अनाहत नाद में। 4.2: … Read more

प्रभु से साक्षात्कार और ‘मैं’ का त्याग | कैवल्य

खंड 3: प्रभु से साक्षात्कार और ‘मैं’ का त्याग 3.1: आंतरिक ध्वनि का बोध वे सोचने लगे —यह कौन सी ध्वनि है,जो बार-बार मेरे अंदर से निकल रही है!यह क्यों इस तरह मेरे अंतर्मन को छू रही है!यह मेरे भीतर की गहराइयों से ही तो उभर रही है!पर यह कौन-सा भाव है,जिसमें मैं रमा जा … Read more

अनाहत नाद और आंतरिक आलोक | कैवल्य

खंड 2: अनाहत नाद और आंतरिक आलोक 2.1: प्रश्न से नाद तक का रूपांतरण यह प्रश्न बार-बार उनके मानस में उठता रहा,और उनके हृदय तक पहुँचकर,एक लहर की तरह उन्हें भीतर तक झंकृत करता रहा।क्षण बीते,प्रहर बीते,दिन बीते,मास बीते,वर्ष बीते,युग बीत गए —और वह लहरउनके मानस से उठकरउनके हृदय तक बार-बार पहुँचती रही,मानो उनका अस्तित्व … Read more

आदि – चैतन्य और प्रथम स्पंदन | कैवल्य

खंड 1: आदि चैतन्य और प्रथम स्पंदन 1.1: निर्विकार का उदय जब कुछ भी नहीं था,न स्थान, न समय,न रूप, न नाम,था वह चैतन्य निर्विकार,निराकार और अनादि था। 1.2: सृष्टि की चाह और साकार रूप का प्राकट्य उस चैतन्य के भीतरजगी थी एक चाह —सृष्टि को प्रकट करने की।उस परम चैतन्य की चाह सेएक दिव्य … Read more