खंड 1: एकात्म का परम अनुभव
1.1: राम में आत्मा का रमण
हर आत्मा को इस सृष्टि में
राम से विलग हो आना है,
हर आत्मा को पुनः
राम में ही मिल जाना है।
प्रभु-स्वर कर्णामृत बना,
शिव-हृदय में उतर गया।
मैं तो राम से विलग हुआ,
फिर राम में समा भी गया।
इस अनुभूति ने राम को,
शिव के रोम-रोम में रमा दिया।
1.2: संकल्पहीन वर्तमान और महाकाल का बोध
उस चैतन्य के भीतर
जगी थी एक चाह —
सृष्टि को प्रकट करने की।
उस परम चैतन्य की चाह से
एक दिव्य साकार रूप प्रकट हुआ।
1.3: संकल्पहीन वर्तमान और महाकाल का बोध
“मेरी यात्रा पूरी हुई,”
इस सोच से निश्चिंत शिव,
राम में सहज रम गए।
भव के भाव थम गए,
श्वासें जैसे रामनाम के
अनाहत नाद में खो गईं।
अब
न वहाँ कोई संकल्प रहा,
न वहाँ कोई विकल्प रहा,
न वहाँ कोई भूत रहा,
न वहाँ कोई भविष्य रहा।
रह गया तो केवल वर्तमान —
स्वयं महाकाल का वर्तमान।
बच गया तो केवल एक अखंड बोध —
“अहं शिवोमारामचंद्रः अस्मि।”