खंड 8: कैवल्य का परम सत्य
8.1: शिव-राम एकात्म का दर्शन
प्रकृति ने कहा — “हे प्रभु!
अब उस समय को लाना ही होगा,
शिव को उनके हृदय में जगाना ही होगा.”
प्रभु भव-भाव में आए,
प्रकृति की क्रियाशक्ति उनमें समाई.
शिव ने कहा — “हे राम!
आप मेरे हृदय में क्यों नहीं आते?”
प्रभु ने कहा — “हे भोलेनाथ!
मुझमें और आपमें भेद कहाँ है?
आप अपने ही रूप में मुझे देख क्यों नहीं पाते?”
8.2: त्रिशूलधारी राम और शिवोमा रामचंद्र
शिव को एक अहसास सा हुआ,
आँख बंद करते ही
उनके हृदय में फिर राम आए.
लेकिन इस बार प्रभु ने
अपने त्रिशूलधारी, नागहार,
चंद्रचूड़ और त्रिनेत्रधारी रूप दिखाए.
उनके बगल में एक देवी भी खड़ी थी.
पर अब शिव को कुछ बताने की
ज़रूरत क्या पड़ी थी? पर फिर भी प्रभु बोले
“शिवोमा रामचंद्रः अस्मि”
आपसे भिन्न नहीं,
आपसे अलग नहीं.
8.3: सृष्टि में शिव और शिव में राम
इस सृष्टि में आपसे क्या अलग है महादेव?
हैं तो केवल आप,
और मैं सदा आप में ही आश्रय पाता हूँ.
इस अनंत ब्रह्मांड की सृष्टि
पूर्ण रूप से केवल आप हैं
और आपमें मैं हूँ सदैव.
सृष्टि में जो है सब शिव है
और हर एक शिव के अंदर राम है.
8.4: मोक्ष का गंतव्य: कैवल्य
केवल शिव, केवल राम
यही कैवल्य की अवस्था है.
कैवल्य में हैं केवल राम,
पर राम सदा शिव के सान्निध्य में हैं.
यही कैवल्य है,
और इसी शोध में
भविष्य में होने वाले
हर जीव की यात्रा का गंतव्य है.
हर आत्मा को इस सृष्टि में
राम से विलग हो आना है
हर आत्मा को पुनः
राम में ही मिल जाना है
पर आत्मा स्वयं शिव है
और शिव में राम है
यही कैवल्य है, यही कैवल्य है
न राम से परे कोई संकल्प है
न शिव से परे कोई विकल्प है
यही कैवल्य है, यही कैवल्य है.