खंड 3: प्रभु से साक्षात्कार और ‘मैं’ का त्याग
3.1: आंतरिक ध्वनि का बोध
वे सोचने लगे —
यह कौन सी ध्वनि है,
जो बार-बार मेरे अंदर से निकल रही है!
यह क्यों इस तरह मेरे अंतर्मन को छू रही है!
यह मेरे भीतर की गहराइयों से ही तो उभर रही है!
पर यह कौन-सा भाव है,
जिसमें मैं रमा जा रहा हूँ?
3.2: प्रकाश में लीनता और शाश्वत प्रश्न
इस प्रश्न के हृदय में आते ही,
वे उस प्रकाश-पुंज को स्पष्ट देख पाते हैं।
आँखें तो अब भी बंद हैं,
वे उन्हीं में रम जाते हैं,
परम आनंद के अतिरेक से भर जाते हैं,
और सहज ही पूछ बैठते हैं —
“मैं कौन हूँ?”
3.3: प्रभु का उत्तर: “मैं सब कुछ हूँ!”
जहाँ अबतक कुछ नहीं था
अब वहाँ आप हैं,
मेरे मन को आनंद से भरने वाले।
आप ही सब कुछ हैं —
यह तो मैं जान गया।
हे प्रभु, यह बता दीजिए —
मैं कौन हूँ?
प्रभु मुस्कुरा उठते हैं
हाँ हाँ! “मैं सब कुछ हूँ!”
3.4: शिव का आत्मबोध: जड़ से चेतन तक
पर आप नेत्र खोलिए
और देखिए मुझे।
मैं तो कुछ नहीं हूँ,
जो हैं — आप ही हैं।
आप ही सर्व हैं,
आप ही सर्वस्व हैं,
आप ही शिव हैं।
मैं सब कुछ हूँ
क्योंकि आपमें और मुझमें कोई भेद नहीं
प्रभु के भाव को समझ
शिव मन ही मन भरमाए।
अब शिव मुस्कुराए —
“मैं तो जड़ था,
आप में रम कर
मैं चेतन हुआ।”
3.5: रम-भाव की पहचान
अब मैं समझ गया,
आप तो अभिराम हैं —
जड़-चेतन जिसमें है,
रम-भाव से रमा हुआ,
आप वह राम हैं।