खंड 6: प्रकृति का इंगित और शिव का महत्व
6.1: प्रभु और प्रकृति का संवाद
यह इंगित पाते ही मानो,
प्रभु की प्रकृति मुस्कुराई,
और वह मुस्कान अनायास ही
प्रभु के अधरों पर भी आई।
अपनीप्रकृति को इंगित कर
प्रभु स्वयं से ही बोले —
“मेरे भक्त काल हैं,
और यही हैं महाकाल भी।
पर क्या इनका इतना सा
परिचय पूरा है?
इनके बिना तो सृष्टि का
परिचय ही अधूरा है।
6.2: शिव और सृष्टि का सम्बन्ध
यही तो वे भाव हैं,
जो मेरे भाव को
सृष्टि के अंत तक बढ़ायेंगे।
यही तो वे हैं, जो
सृष्टि में उत्पन्न मेरे सभी भावों को
उसकी भवितव्यता से मिलायेंगे।
यही तो मेरा संकल्प है।
फिरस्वयं में रमते हुए
इनको कल्पों तक देखना
ही तो एकमात्र विकल्प है।
6.3: शिव की जागृति और के विस्तार का सम्बन्ध
पर अब इन्हें जागना होगा,
और मेरे भाव को लिए
आगे बढ़ना होगा।
प्रभुकी प्रकृति पुनः मुस्कुराई,
और इस बार तो बोल ही पड़ी —
“अगर इन्हें आपके भाव को लिए
आगे बढ़ना होगा,
तो प्रभु, आपको भी
कुछ और करना होगा।”