राम की लीला और शिव की भूमिका | राम बने कृष्ण

खंड 4: राम की लीला और शिव की भूमिका


4.1: साकेत में शिव का अनुभव

अब तो शिव-मानस में

एक संसार उतर आया,

देखते ही देखते साकेत का द्वार दृष्टिगोचर हुआ।

पुरी में प्रवेश कर, दोनों महल में पहुँच गए।

जब प्रभु के समीप माता सीता आयीं,

तो शिव के हृदय के परमानन्द के बाँध टूट गए।

करुणा के समुद्र में आप्लावित हो शिव,

मानो स्वयं ही अपना शिवत्व विस्मृत कर बैठे।

इसके सामने कैवल्य का सुख क्या था!

प्रभु-प्रेम में स्वयं को भुला देना,

आत्मबोध से भी अधिक सुखद है।

फिर भरत, लक्ष्मण, शत्रुघघ्न —

चारों भाइयों को साथ-साथ देखा,

शिव के आनन्द की नहीं रही कोई सीमा रेखा।

हनुमान को देखकर तो स्वयं को ही भूल बैठे,

और अपनी भक्ति का मूर्त रूप मान बैठे।


4.2: कृष्ण रूप का रहस्य और संसार का विस्तार

तब राम ने शिव को गले लगाया —

“आपके लिए भी कुछ ऐसा ही संकल्प है,

और सांसारिक होना ही एकमात्र विकल्प है।

मेरे कृष्ण-रूप के आकर्षण को अपनाना होगा,

आपको अपना संसार आगे बढ़ाना होगा।

मैं तो सदा आपके हृदय में ही रहूँगा,

पर आपके जो भी अंश संसार में जाएँगे,

अंदर बसे राम को भूल

कृष्ण की माया में पड़ जाएँगे।”

राम रूप में मैं पूर्ण हूँ,

और सदैव सर्वदा एकात्मक हूँ।

इस रूप के जो मेरे भक्त होते हैं,

वे आत्मबोध पाते हैं,

मुझ जैसे हो जाते हैं।

कृष्ण रूप में मैं बँट जाता हूँ,

टुकड़ों-टुकड़ों में हो जाता हूँ।

अपने भक्तों के जैसा बनकर,

मैं स्वयं कृष्ण रूप से उन्हें प्राप्त होता हूँ।

राम रूप में मैं एक हूँ,

कृष्ण रूप में मैं अनेक हूँ।

मैं एकात्मक राम,

सर्वात्मक कृष्ण बन जाता हूँ।


4.3: सृष्टि का परम सत्य और भूमिकाओं का विभाजन

आपको सांसारिक बनाकर संसार को बढ़ाना है,

पर वह आधा ही सत्य है।

मुझे पूरा सत्य आपको बताना है।

मेरी सृष्टि के आगे बढ़ाने के संकल्प को पूरा करने हेतु,

आपके हृदय में बसे मेरे राम रूप के हृदय से,

उस रूप के हृदय में बसी प्रकृति निकलकर दूर हो गई।

पुरुष रूप कृष्ण को वहीं छोड़,

प्रकृति रूप राधा चिरंतन रूप से अलग रहने के लिए मजबूर हो गई।

अब आपको सांसारिक बनकर संसार में जाना होगा,

और मेरे कृष्ण रूप के टुकड़ों को मिलाना होगा।

जब सारे टुकड़े पुनः मिल जाएंगे,

तब राधा-कृष्ण पुनः एक होकर,

मेरे राम रूप को पाएंगे।

शिव कहते हैं —

“हे प्रभु, यह सब कहानी आपने स्वयं ही लिख डाली।

फिर यह मेरा और प्रभु कृष्ण का संसार कैसे हुआ?”

राम ने कहा —

“आप अपने मानस में मेरी कथा लिखने के लिए स्वतंत्र होंगे।

आपके मानस में लिखी कथा ‘रामायण’ कहलाएगी।

और आपके मानस की कथा के अनुसार कार्य करते हुए,

यह राम हर कल्प में एक बार आपकी सृष्टि में जरूर आएगा।

और सृष्टि के सभी कार्य कृष्ण की इच्छा के अनुरूप होंगे।

कृष्ण हर ब्रह्माण्ड में सभी कारणों के कारण होंगे।

आप महाशिव जिस प्रकार भव के परम स्वरूप हैं,

उसी प्रकार मेरे महाविष्णु रूप में, कृष्ण, भाव के परम स्वरूप होंगे।

पूरा संसार आपका लोक होगा, और कृष्ण के लिए गोलोक होगा।

जब भी किसी नए ब्रह्माण्ड की आपसे उत्पत्ति होगी,

महाविष्णु उसमें विष्णु स्वरूप में व्याप्त होंगे।

सृष्टि के लिए विष्णु से ब्रह्मा उत्पन्न होंगे,

और संहार के कार्य हेतु आप उसमें शिव स्वरूप में प्रवेश करेंगे।”

सब अपनी-अपनी शक्ति को पाएंगे

और आपकी सृष्टि में अपनी-अपनी भूमिका निभाएंगे।