शिव और कृष्ण का संवाद | राम बने कृष्ण

खंड 3: शिव और कृष्ण का संवाद


3.1: कृष्ण और शिव का साक्षात्कार

राधा दूर और दूर होती गईं,

कृष्ण अपनी पीड़ा छिपाकर,

शिव के हृदय से बाहर आए,

और शिव पर अनायास मुस्कुराए।

शिव बोल उठे —

“हे प्रभो! हे राम!

आप मेरे हृदय से क्यों निकल आए?”

कृष्ण ने कहा —

“हे शिव! मैं हूँ कृष्ण।

रामस्वरूप ही हूँ, पर कर्म में हूँ भिन्न।


3.2: सृष्टि को आगे बढ़ाने का संकल्प

यह सृष्टि राम में रमती है,

और राम इस सृष्टि में रमे रहते हैं।

पर राम का एक संकल्प है —

इस सृष्टि को आगे बढ़ाने का।

सृष्टि को आगे बढ़ाने हेतु,

भिन्न-भिन्न प्राणियों को

इस लीला-जगत में लाना होगा।

और इस राम-कार्य हेतु,

मुझे उन सबको राम से विलग कर

संसार में उतारना होगा।

इस कार्य को यहीं से आरंभ करना होगा,

मुझे आपसे ही शुरुआत करनी होगी।

मेरे इस प्रयत्न को सफल बनाने हेतु,

आपको सांसारिक बनना होगा।”


3.3: शिव की जिज्ञासा और राम का रहस्योद्घाटन

कृष्ण को देख शिव चमत्कृत हैं —

“मैं तो इनमें स्वयं रमा हूँ,

ये तो मुझमें स्वयं बसे हैं।

फिर ये रामस्वरूप कौन-सी शक्ति है

जो मुझे बाहर खींच रही है,

मुझे सांसारिक बनाना चाह रही है?

राम तो स्वयं परमानन्द हैं,

पूर्णकाम और पूर्ण समाधान।

ये भी बिल्कुल वैसे ही हैं,

पर इनकी इन चपल आँखों में

यह कौन-सी खोज दिख रही है?

मुझे यह रहस्य जानना होगा…”

शिव की आँखें मुँद जाती हैं,

राम पुनः हृदय में समाते हैं।

शिव सहसा पूछ बैठते हैं —

“हे प्रभो! यह रहस्य कैसा है?

अन्तरात्मा में बसने वाले आप,

मुझे बाहर क्यों खींच रहे हैं?

यह आपका कैसा रूप है?

यह आपकी कैसी अद्भुत लीला है?

आपने ही तो कहा था प्रभो —

‘हर आत्मा को इस सृष्टि में

राम से विलग होकर आना है,

हर आत्मा को पुनः

राम में ही मिल जाना है।’

मैं तो अपनी यात्रा पूर्ण कर चुका,

अन्तरात्मा में आपको पाकर

मैं आपसे एकात्म हो चुका हूँ।

क्या यह मिथ्या है?

क्या यह मेरा भ्रम है?”

राम बोले —

“नहीं-नहीं, यह सत्य है।

एकात्मक हैं हम,

बिल्कुल एक जैसे।

इसमें कोई संदेह नहीं।”

शिव बोले —

“फिर मुझसे यह दुराव कैसा?

मुझसे परायेपन का यह व्यवहार कैसा?”

राम उत्तर देते हैं —

“परायापन कहाँ, शिव!

यह एकात्म की ही अगली राह है।

अपने को और अधिक अपना बनाने की चाह है।

आपने मुझे अपने भीतर पहचान लिया —

अब मुझे अपने से बाहर भी पहचानना होगा।”