राम और कृष्ण: कला का राम रहस्य

🔹 श्री राम का परम स्वरूप – कला का रहस्य और सार श्रीराम परात्पर ब्रह्म हैं, जिनकी परम सत्ता इस संपूर्ण ब्रह्मांड के परे साकेत में स्थित है। वे अपरिवर्तनीय (immutable) स्वरूप वाले ‘कूटस्थादिपुरुष’ हैं, जो ‘कलानिधि’ अर्थात् समस्त कलाओं के मूल स्रोत हैं। नारद पञ्चरात्र और श्रीमद्भागवत पुराण जैसे शास्त्र उनके इसी परम स्वरूप … Read more

The Genesis of Ram Rahasya: A Journey from Childhood Inquiry to Cosmic Revelation

Childhood Roots and Formative Influences My journey toward what would eventually evolve into Ram Rahasya began not in the hallowed halls of academia, nor in the stillness of Dhyana. It began in the simple yet profound atmosphere of my childhood village—shaped by the everyday wisdom of my father, a remarkable science teacher with a deeply … Read more

विराट से परे दुर्धर्ष: जब राम ने देवों को बताया अपना मूल स्वरूप

कृष्ण – विराट रूप एवं राम – दुर्धर्ष रूप परिचय सनातन धर्म में ईश्वर के अनगिनत रूपों का वर्णन है, जो हमें उस परम सत्ता की असीम महिमा और उसके विविध आयामों का बोध कराते हैं। इन दिव्य अभिव्यक्तियों में से दो ऐसे आयाम हैं जो विशेषतः गहरे और रहस्यमय हैं: ‘विराट’ और ‘दुर्धर्ष’। जहाँ … Read more

राम रहस्य: अनादि सत्य की अनुभूति

जब काल नहीं था, तब भी “वह” विद्यमान थे। जब सृष्टि में न कोई काल था, न कोई स्थान। न कोई रूप, न कोई नाम। फिर भी वहाँ एक परमचैतन्य थे, निराकार, विकार-रहित, अनादि, और अनंत। वही, जिसे शास्त्रों ने ब्रह्म और परब्रह्म कहा है। वही अखंड सत्य, जिसका कोई आरंभ नहीं, कोई अंत नहीं, … Read more

कैवल्य: आत्मबोध और एकात्म की यात्रा (मुखपृष्ठ)

कैवल्य: आत्मबोध और एकात्म की यात्रा” नामक काव्य-प्रकाशन के मुखपृष्ठ की यह छवि Microsoft Copilot द्वारा तैयार की गई है, जो आपकी कल्पना को दृश्य रूप देने के लिए समर्पित है।

कैवल्य: आत्मबोध और एकात्म की यात्रा

जब चेतना का प्रथम स्पंदन हुआ, जब अस्तित्व ने अपने होने का प्रश्न किया—उस यात्रा को शब्दों में ढालना किसी साधना से कम नहीं। “कैवल्य: आत्मबोध और एकात्म की यात्रा” केवल एक कविता नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अन्वेषण की वह पथगामी रचना है, जो शिव और राम के गहन संवाद के माध्यम से आत्मा की अनंत … Read more

शिव की यात्रा: राम का अनुसंधान

यह कविता सृष्टि के उद्गम से लेकर आत्मबोध तक की एक सूक्ष्म यात्रा है, जिसमें साधक धीरे-धीरे यह अनुभव करता है कि जो प्रश्न वह परम से कर रहा था, उसका उत्तर स्वयं उसके भीतर ही था। यही मिलन है — जड़ से चैतन्य तक, ‘मैं’ से ‘शिव’ तक, परम तत्त्व राम का अनुसन्धान है … Read more