मलूक शतक अर्थसहित

मलूक शतक राम रहस्य दर्शन और परात्पर भगवान श्रीराम के स्वरुप को उजागर करने वाला एक दुर्लभ ग्रन्थ है। नीचे मलूक शतक के सभी दोहे अर्थ सहित प्रस्तुत किये जा रहे हैं। दोहा संख्या ४५ और ४९ अभी उपलब्ध नहीं हो पाए हैं।

मलूक शतक अर्थ सहित - Saint Malook Das in deep prayer before Bhagwan Ram — a serene moment of devotion symbolizing the essence of Maluk Shatak. This is Copilot Generated.
“Sant Malook Das offering heartfelt worship to Shri Ram — the spirit of Maluk Shatak embodied in devotion.” Image generated by Microsoft Copilot

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दोहा:
मरकत मणि सम श्याम है श्री सीतापति रूप ।
कोटि मदन सकुचात लखि नमै ‘मलूक’ अनूप ॥१॥

अर्थ:
श्री सीतापति भगवान श्रीराम मरकत मणि के समान श्यामवर्ण हैं। उनकी अनुपम शोभा देखकर करोड़ों कामदेव भी लज्जित होकर लजाते हैं और नमस्कार करते हैं।


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दोहा:
कह ‘मलूक’ श्रीराम ही धर्मोद्धारन काज ।
श्रीमद्रामानन्द भे भाष्यकार यतिराज ॥२॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं कि श्रीराम ही धर्म की स्थापना के हेतु प्रकट हुए। उनके लिए जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्य ने भाष्य रचा और यतिराज कहलाए।


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दोहा:
जगद्गुरु रामानन्दजी आचार्यन शिरताज ।
तिनहिं ‘मलूका’ नमत है जय जय श्रीयतिराज ॥३॥

अर्थ:
जगद्गुरु श्रीरामानन्दाचार्य जी आचार्यों के शिरोमणि हैं। ‘मलूक’ उनको नमन करते हैं — जय हो श्री यतिराज!


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दोहा:
कह ‘मलूक’ प्रस्थान त्रय भाष्य रच्यो आनन्द ।
श्रीवैष्णव मत कमल रवि स्वामी रामानन्द ॥४॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं कि श्रीस्वामी रामानन्द जी ने प्रस्थानत्रयी (उपनिषद्, गीता, ब्रह्मसूत्र) पर भाष्य रचा। वे श्रीवैष्णव मतरूपी कमल के सूर्य हैं।


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दोहा:
जिनकी अनुपम कृपा से तत्त्व परयो पहिचान ।
उन श्रीगुरुपद पद्म का धरत ‘मलूका’ ध्यान ॥५॥

अर्थ:
जिन श्रीगुरु की अनुपम कृपा से तत्त्वज्ञान की पहचान हुई, उन श्रीगुरुपदकमल का ‘मलूक’ निरंतर ध्यान करते हैं।


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दोहा:
तत्त्व विशिष्टाद्वैत है यही वेद-सिद्धान्त ।
कहै ‘मलूका’ लखि परै गुरु की कृपा अभ्रान्त ॥६॥

अर्थ:
वेदों का सिद्धान्त विशिष्टाद्वैत ही है — ‘मलूक’ कहते हैं, यह ठीक से समझ में आता है जब गुरु की कृपा होती है।


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दोहा:
जीव प्रकृति ईश्वर इन्हीं तीन तत्त्व का ज्ञान ।
आवश्यक है मोक्ष महँ कहै ‘मलूका’ तान ॥७॥

अर्थ:
मोक्ष के लिए तीन तत्त्व — जीव, प्रकृति और ईश्वर — का ज्ञान आवश्यक है, ‘मलूक’ यही स्वर गाते हैं।


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दोहा:
ज्ञानाश्रय है आत्मा देहेन्द्रिय नहिं प्रान ।
कहै ‘मलूका’ नित्य अरु निर्विकार तेहि जान ॥८॥

अर्थ:
आत्मा ज्ञानस्वरूप है — न वह शरीर है, न इन्द्रिय, न प्राण। ‘मलूक’ कहते हैं उसे नित्य और निर्विकार जानो।


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दोहा:
कहै ‘मलूका’ राम के ये शरीर अरु शेष ।
स्वप्रकाश अणु जीव हैं धार्य नियाम्य अशेष ॥९॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — राम के शरीर, शेष आदि दिव्य हैं। जीव सूक्ष्म, स्वप्रकाश और राम द्वारा धार्य एवं नियन्त्रित हैं।


📜 १०

दोहा:
सदा पराश्रित जीव हैं राम सदैव स्वतन्त्र ।
कहै ‘मलूका’ भ्रान्त जो जीवहिं कहें स्वतन्त्र ॥१०॥

अर्थ:
जीव सदा पराधीन हैं और श्रीराम सदा स्वतंत्र हैं। ‘मलूक’ कहते हैं — जो जीव को स्वतन्त्र मानते हैं, वे भ्रमित हैं।


📜 ११

दोहा:
सदा प्रकार्यद्वैत को कहै तत्त्वमसि-वाक्य ।
नाहिं प्रकाराद्वैत यह कहत ‘मलूका’ वाक्य ॥११॥

अर्थ:
‘तत्त्वमसि’ वाक्य का तात्पर्य सदा भेद में ही है,
‘मलूक’ कहते हैं — यह अभेद नहीं सिखाता।


📜 १२

दोहा:
सदा प्रकारी राम हैं चिदचिद् देह प्रकार ।
‘यस्यात्मा’ इत्यादि श्रुति कहैं ‘मलूका’ सार ॥१२॥

अर्थ:
राम सदा चेतन-अचेतन देहों में प्रकट रहते हैं,
‘यस्यात्मा’ आदि श्रुति इसका सार कहती हैं — यह ‘मलूक’ का मत है।


📜 १३

दोहा:
तत् पद कहै परेशकों कहै ‘मलूका’ जान ।
त्वद्देही त्वं पद कहें दोउ प्रभु-ऐक्य बखान ॥१३॥

अर्थ:
‘तत्’ पद परमेश्वर को दर्शाता है — ‘मलूक’ ऐसा मानते हैं,
‘त्वं’ पद जीव देही को कहता है — दोनों का ऐक्य उपयुक्त रीति से बताया गया है।


📜 १४

दोहा:
नित्यपदस्थित ईश ही अन्तर्यामी होय ।
नाम रूप व्याकरण हित एक ‘मलूका’ दोय ॥१४॥

अर्थ:
जो ईश्वर नित्यपद में स्थित हैं वही अन्तर्यामी हैं,
नाम-रूप के भेद को समझने हेतु ‘मलूक’ कहते हैं — एक में दो भाव हैं।


📜 १५

दोहा:
जीव अज्ञ सर्वज्ञ प्रभु केहि विधि दुइनौं एक ।
कहै ‘मलूका’ भ्रान्त जो जीव ब्रह्म कहें एक ॥१५॥

अर्थ:
अज्ञ जीव और सर्वज्ञ ईश्वर — ये दोनों एक कैसे हो सकते हैं?
‘मलूक’ कहते हैं — जो जीव को ब्रह्म कहते हैं, वे भ्रम में हैं।


📜 १६

दोहा:
सामानाधिकरण्य नहिं बनै तत्त्वमसि ठौर ।
जीव ब्रह्म के भेद बिन कहै ‘मलूका’ और ॥१६॥

अर्थ:
‘तत्त्वमसि’ का सामान्याधिकरण्य सिद्ध नहीं बनता,
‘मलूक’ कहते हैं — जीव और ब्रह्म में भेद रहे बिना यह नहीं टिकता।


📜 १७

दोहा:
भेद प्रवृत्तिनिमित्त का एक अर्थ पुनि होय ।
सामानाधिकरण्य तहँ कह ‘मलूक’ सब कोय ॥१७॥

अर्थ:
भेद प्रवृत्तिनिमित्त से एक विशेष अर्थ होता है,
वहीं सामान्याधिकरण्य टिकता है — ऐसा ‘मलूक’ कहते हैं।


📜 १८

दोहा:
तत् त्वं पद की लक्षणा चेतन में ही जान ।
कहत ‘मलूका’ अस कबहुँ कहूँ न नर मतिमान् ॥१८॥

अर्थ:
‘तत्-त्वं’ पदों की लक्षणा केवल चेतन में ही जाननी चाहिए,
‘मलूक’ कहते हैं — कोई विवेकी व्यक्ति इससे अन्य अर्थ न गढ़े।


📜 १९

दोहा:
अन्वय अरु तात्पर्य की अनुपपत्ति जब होय ।
तबहि ‘मलूका’ लक्षणा मानत है सब कोय ॥१९॥

अर्थ:
जब शब्दों का सीधा अर्थ और तात्पर्य पूरा न हो,
तब लक्षणा अर्थ लिया जाता है — ऐसा ‘मलूक’ मानते हैं।


📜 २०

दोहा:
केहि विधि दुइ कारण बिना यहाँ लक्षणा होय ।
कहैं ‘मलूका’ कार्य कहुँ बिन कारण ही होय? ॥२०॥

अर्थ:
दो कारणों के बिना लक्षणा अर्थ संभव नहीं,
‘मलूक’ पूछते हैं — कार्य बिना कारण के कैसे होगा?


📜 २१

दोहा:
जीवपनायुत ब्रह्म के भेदवान् नहिं जीव ।
वस्तुपना से घट सदृश सुनहु ‘मलूका’ जीव ॥२१॥

अर्थ:
जीव और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है,
‘मलूक’ कहते हैं — जीव तो घट की भांति वस्तुपना मात्र है।


📜 २२

दोहा:
कह ‘मलूक’ तुम यह कहौ भेद कहाँ सुप्रसिद्ध ।
जीव बीच तब बाध हो नहीं तो साध्य असिद्ध ॥२२॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — यदि तुम भेद को नहीं मानते, तो तुम्हारा यह मत प्रसिद्ध है,
परंतु जीव और ब्रह्म के बीच बाधा आएगी, इसलिए यह मत सिद्ध नहीं होगा।


📜 २३

दोहा:
चेतनपनसे मुक्ति महँ प्रभु से जीव अभिन्न ।
ब्रह्म सदृश अस वचन सुनि होत ‘मलूका’ खिन्न ॥२३॥

अर्थ:
चेतना से मुक्ति में प्रभु और जीव अभिन्न होते हैं,
‘मलूक’ कहते हैं — ब्रह्म सदृश यह बात सुनकर वे खिन्न होते हैं।


📜 २४

दोहा:
सोपाधिक यह हेतु है भवकर्तृत्व उपाधि ।
कहत ‘मलूक’ प्रकाशपन अद्वैतिन कहँ व्याधि ॥२४॥

अर्थ:
सोपाधिक कारण से ‘भवकर्ता’ की उपाधि लगती है,
‘मलूक’ कहते हैं — प्रकाश और अंधकार वाले अद्वैतवादियों में व्याधि है।


📜 २५

दोहा:
पक्ष तथा दृष्टान्त यदि भिन्न होयँ तब बाध ।
कहत ‘मलूक’ भेद बिन उदाहरण नहिं साध ॥२५॥

अर्थ:
यदि दृष्टिकोण और उदाहरण भिन्न हों तो बाधा उत्पन्न होती है,
‘मलूक’ कहते हैं — बिना भेद के उदाहरण से सिद्धि नहीं होती।


📜 २६

दोहा:
गति आगति उत्क्रान्ति ये तीन जीव की होय ।
कह ‘मलूक’ तेहि हेतु से नाहिं जीव विभु होय ॥२६॥

अर्थ:
जीव की गति, आगति, और उत्क्रांति होती है,
‘मलूक’ कहते हैं — इसलिए जीव सर्वशक्तिमान (विभु) नहीं हो सकता।


📜 २७

दोहा:
जीव कर्मवश गहत हैं कोरी कुंजर देह ।
ताते मध्यम मान नहिं कह ‘मलूक’ सस्नेह ॥२७॥

अर्थ:
जीव कर्मों के प्रभाव में कोरी (खाली) कुंजर के समान देह धारण करता है,
‘मलूक’ कहते हैं — इसे मध्यम न मानो, यह स्नेहपूर्ण उपमा है।


📜 २८

दोहा:
संकोचादिक के भये होवे जीव विनाश ।
अवयववाली वस्तु का होत ‘मलूका’ नाश ॥२८॥

अर्थ:
संकोच आदि कारण से जीव का विनाश होता है,
‘मलूक’ कहते हैं — अवयवों वाली वस्तु का नाश होना स्वाभाविक है।


📜 २९

दोहा:
अभ्यागत बिन किये का कृत का होय विनाश ।
तेहिसे कहत ‘मलूक’ है आत्मा है अविनाश ॥२९॥

अर्थ:
यदि अभ्यागत (प्रभाव) न हो तो कर्म का विनाश कैसे होगा?
‘मलूक’ कहते हैं — इसलिए आत्मा अविनाशी है।


📜 ३०

दोहा:
कह ‘मलूक’ यह जीव अणु हृदय बीच है थान ।
दीप प्रभा सम ज्ञान से शिर पीड़ादिक जान ॥३०॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — यह जीव सूक्ष्म अणु है, हृदय में स्थित है,
जैसे दीपक की लौ से प्रकाश निकलता है, वैसे ज्ञान से दुख-पीड़ा समझो।


📜 31

दोहा:
ज्ञानरूप है आत्मा धर्म ज्ञान से भिन्न ।
प्रत्यकूपन अरु पराकूपन से ‘मलूक’ दोउ भिन्न ॥३१॥

अर्थ:
आत्मा ज्ञान का स्वरूप है, परन्तु वह ज्ञान से अलग है,
‘मलूक’ कहते हैं — यह ज्ञान के प्रकारों, प्रत्यक्ष और परोक्ष, दोनों से भिन्न है।


📜 32

दोहा:
‘मैं जानौं’ परतीति यह सार्वजनिक निर्बाध ।
ज्ञाता भिन्न ‘मलूक’ यह प्रतीति ज्ञानहिं साध ॥३२॥

अर्थ:
‘मैं जानता हूँ’ की भावना सार्वभौमिक और अवरोधित है,
‘मलूक’ कहते हैं — ज्ञाता और ज्ञान भिन्न हैं, और यह अनुभूति ज्ञान को साधती है।


📜 33

दोहा:
कोई कहते आत्मा सब देहन महँ एक ।
भिन्न भिन्न सब देह महँ कहत ‘मलूक’ अनेक ॥३३॥

अर्थ:
कुछ कहते हैं कि आत्मा सभी शरीरों में एक ही है,
‘मलूक’ कहते हैं — क्योंकि शरीर भिन्न-भिन्न हैं, आत्मा भी अनेक है।


📜 34

दोहा:
कह ‘मलूक’ सब देह के जीव होयँ यदि एक ।
एक काल महँ दुःख इक सुख भोगैं किमि एक ॥३४॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — यदि सभी शरीरों के जीव एक हों, तो एक ही समय में सुख-दुःख कैसे भोगेंगे?


📜 35

दोहा:
देह भेद से जा कहहु सुखी दुखी का भेद ।
क्यों न ‘मलूका’ सौभरिहिं सुख-दुख तनु के भेद ॥३५॥

अर्थ:
देह के भेद से ही सुख-दुख का भेद होता है,
‘मलूक’ कहते हैं — तो क्यों न सुख-दुख को भी देह के रूप में समझा जाए?


📜 36

दोहा:
बद्ध मुक्त अरु नित्य यह जीव भेद हैं तीन ।
कह ‘मलूक’ अन्यत्र पुनि बहुत भेद हैं कीन ॥३६॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — जीव के तीन भेद हैं: बंधित, मुक्त और नित्य,
और इसके अलावा भी अनेक भेद होते हैं।


📜 37

दोहा:
अचित् तत्त्व —
मिश्र शुद्ध सत् काल यह अचित् भेद हैं तीन ।
कह ‘मलूक’ चौबीस तहँ मिश्र-भेद हैं कीन ॥३७॥

अर्थ:
यह तीन भेद हैं — मिश्र, शुद्ध और सत् काल के,
‘मलूक’ कहते हैं — और कुल मिलाकर चौबीस मिश्रित भेद हैं।


📜 38

दोहा:
कह ‘मलूक’ प्रकृती महत् अहङ्कार त्रय जान ।
एकादश इन्द्रियन का सात्विक कारण मान ॥३८॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — प्रकृति, महत्त्व, अहंकार ये तीन हैं,
और एकादश इन्द्रियों को सात्विक कारण माना जाता है।


📜 39

दोहा:
तामस से तन्मात्र अरु पंच भूत हू होय ।
कह ‘मलूक’ राजसः पुनः उभय सहायक होय ॥३९॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — तामस से तन्मात्र और पंच भूत होते हैं,
राजस गुण इन्हें सहायक बनाता है।


📜 40

दोहा:
शुद्धसत्व अथवा नित्यविभूति —
कहत ‘मलूका’ शुद्धसत् नित्यविभूतिहि जान ।
“तद्विप्णोः परमं पदम्” तहँ यह श्रुतिहि प्रमान ॥४०॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — शुद्धसत्त्व को नित्यविभूति समझो,
“तद्विप्णोः परमं पदम्” (उच्चतम पद) का श्रुति प्रमाण है।


📜 41

दोहा:
काल —
भूत भविष्यत् आदि सब व्यवहारन का मूल ।
कहत ‘मलूका’ काल है कालहिं भूलि न भूल ॥४१॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — भूत, भविष्य और अन्य सभी व्यवहारों का मूल काल है,
इसे भूलना नहीं चाहिए।


📜 42

दोहा:
जगन्मिथ्यात्व-निरास —
कह ‘मलूक’ झूठे कहहिं झूठी ऐसी बात ।
ब्रह्म सत्य अरु जग मृषा परमारथ नहिं तात ॥४२॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — यह झूठी बात है कि जगत मिथ्या है,
ब्रह्म सत्य है और जगत माया नहीं है।


📜 43

दोहा:
सर्व विशेषण से रहित ब्रह्म एक अद्वैत ।
ब्रह्मसत्यपन हेतु तब कह ‘मलूक’ किमि देत ॥४३॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — जो ब्रह्म है वह सभी विशेषणों से रहित एक अद्वैत है,
ब्रह्म की सत्यता हेतु ऐसा कहा जाता है।


📜 44

दोहा:
दृश्यपनहु के हेतु जो जग कहँ मृषा बखान ।
कह ‘मलूक’ तेहि हेतु को सोपाधिक पहिचान ॥४४॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — जो जगत को मिथ्या कहते हैं, वह केवल दृश्यपन के कारण है,
इसे सोपाधिक (अस्तित्व उपाधि) समझना चाहिए।


📜 45

दोहा:
(यह दोहा मूल सूची में नहीं था, कृपया यदि चाहें तो मैं अगले दोहे जारी रख सकता हूँ।)


📜 46

दोहा:
व्याप्ति कौनसी रीति से गही बतावहु और ।
मिथ्यापन अरु दृश्यपन की ‘मलूक’ केहि ठौर ॥४६॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — बताओ कि व्याप्ति (व्यापकता) किस प्रकार समझी जाए?
मिथ्या और दृश्यपन (दिखावटी होना) के विषय में भी कुछ स्थान हैं।


📜 47

दोहा:
शुक्ति रजत थल कहहु तो नहिं ‘मलूक’ निस्तार ।
देखहु आनॅंदभाष्य का चतुःसूत्र-विस्तार ॥४७॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — यदि कहा जाए कि शुक्ति (मोती), रजत (चांदी), थल (भूमि) हैं, तो यह समाधान नहीं है,
आनंदभाष्य के चतुःसूत्र विस्तार को देखो।


📜 48

दोहा:
शुक्तिरजत यहि ज्ञान का विषय सत्य पहिचान ।
है यथार्थ विज्ञान सब कहत ‘मलूका’ जान ॥४८॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — मोती और चांदी की तरह ही ज्ञान सत्य का विषय है,
यह यथार्थ विज्ञान है, सभी इसे स्वीकारते हैं।


📜 49

दोहा:
(मूल सूची में यह दोहा भी नहीं था।)


📜 50

दोहा:
ईश्वरतत्त्व —
सिरजन संहारन तथा जग के पालनहार ।
कहै ‘मलूका’ राम ही ईश सर्व-आधार ॥५०॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — ईश्वर तत्त्व वह है जो सृष्टि करता, संहार करता और जगत का पालन करता है,
और वह श्रीराम ही ईश्वर और सर्वाधार हैं।


📜 51

दोहा:
मोक्ष काम धर्मार्थ के देनहार श्रीराम ।
दिव्य देह शुभ गुणन के हैं ‘मलूक’ शुभ धाम ॥५१॥

अर्थ:
श्रीराम मोक्ष, काम, धर्म और अर्थ के दाता हैं।
उनका दिव्य शरीर गुणों से परिपूर्ण है, और ‘मलूक’ कहते हैं कि यह शुभ धाम है।


📜 52

दोहा:
देह रूप अरु गुणन से व्यापक प्रभु सब ठौर ।
कह ‘मलूक’ सब वस्तु के बाहर भीतर और ॥५२॥

अर्थ:
प्रभु शरीर और गुणों के रूप में सब जगह व्याप्त हैं,
‘मलूक’ कहते हैं कि वे सब वस्तुओं के अंदर और बाहर हैं।


📜 53

दोहा:
कह ‘मलूक’ परभक्ति से तुष्ट होयँ श्रीराम ।
निज भक्तहिं सायुज्य तब देत अखिलपति राम ॥५३॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — श्रीराम परभक्ति से प्रसन्न होते हैं,
और अपने भक्तों को सायुज्य (निकटता) प्रदान करते हैं।


📜 54

दोहा:
पर व्यूह अरु विभव अरु अन्तर्यामी मान ।
कह ‘मलूक’ अर्चातनुहिं हरि पञ्चम थिति जान ॥५४॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — प्रभु के अनेक रूप, विभव, और अंतर्यामी स्वरूप हैं,
और वे पंचम अवतार के रूप में अर्चातनुहिं (पूज्य शरीर) के समान हैं।


📜 55

दोहा:
पर साकेतनिवास हैं अवतारी श्रीराम ।
कह ‘मलूक’ परिकरनयुत वैदेही-अभिराम ॥५५॥

अर्थ:
श्रीराम अवतार रूप में साकेत (अयोध्या) में निवास करते हैं।
‘मलूक’ कहते हैं कि वे वैदेही (सीता) सहित और कई परिकर (सहायक) सहित हैं।


📜 56

दोहा:
वासुदेव इत्यादि कहँ चतुर्यूह पहिचान ।
कह ‘मलूक’ मत्स्यादि कहँ विभव रूप से मान ॥५६॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — वासुदेव आदि चतुर्-व्यूह (चारों दिशाओं के संरचना) के रूप में पहचाने जाते हैं,
और मत्स्यादि अवतारों को विभव रूप से माना जाता है।


📜 57

दोहा:
अन्तर्यामी रमे जस मेहँदी लोहित रूप ।
कह ‘मलूक’ अवधादि महँ अर्चामूर्ति अनुप ॥५७॥

अर्थ:
अन्तर्यामी रूप में राम मेहँदी (केसरिया) और लाल रंग के हैं,
‘मलूक’ कहते हैं कि अवध सहित अन्य स्थानों में वे पूज्य मूर्ति के समान हैं।


📜 58

दोहा:
श्रीअवधपुरी —
हनुमदादि भरतादि सह तथा जानकी साथ ।
कह ‘मलूक’ जहँ कीन प्रभु निज लीला रघुनाथ ॥५८॥

अर्थ:
श्रीराम की अवधपुरी में हनुमान, भरत आदि तथा जानकी (सीता) के साथ रहते हैं।
‘मलूक’ कहते हैं — वहीं प्रभु ने अपनी लीला दिखाई।


📜 59

दोहा:
श्रीसरयू लीला लीला-धाम की ललित जहाँ विख्यात ।
कह ‘मलूक’ सुरसरित तेहि सरयुहिं लखि सकुचाति ॥५९॥

अर्थ:
श्रीसरयू नदी और उसके किनारे की लीला-भूमि सुंदर और प्रसिद्ध है।
‘मलूक’ कहते हैं — सुरसरित (देवों की नदी) सरयू को लखि (देख) मन प्रसन्न होता है।


📜 60

दोहा:
अवधपुरी सो श्रेष्ठतम मोक्षदानि सुखखानि ।
महिमा तासु ‘मलूक’ पुनि को कवि सकै बखानि ॥६०॥

अर्थ:
अवधपुरी सर्वोच्च स्थान है जो मोक्ष और सुख देता है।
‘मलूक’ कहते हैं — इसकी महिमा को कौन कवि वर्णन कर सके?


📜 61

दोहा:
पञ्च संस्कार —
ऊर्ध्वपुण्ड्र से होत सुख मोक्ष तथा दुखनाश ।
कह ‘मलूक’ सो पुण्ड्र लखि यम-गण होत हताश ॥६१॥

अर्थ:
पंच संस्कारों में ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाना सुख, मोक्ष और दुखों के नाश का कारण है।
‘मलूक’ कहते हैं — यह पुण्ड्र देखकर यमदूत भी निराश हो जाते हैं।


📜 62

दोहा:
धनुर्बाण-अंकित भुजा जो जन होत ‘मलूक’ ।
सर्वपाप से मुक्त तेहि पर पद मिलत अचूक ॥६२॥

अर्थ:
धनुष और बाण अंकित भुजा वाला व्यक्ति ‘मलूक’ कहलाता है।
ऐसे व्यक्ति सभी पापों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त होते हैं।


📜 63

दोहा:
भगवत् पूर्व ‘मलूक’ पुनि नाम अन्त महँ दास ।
मुक्ति मिलत तब, शास्त्र कह जीव मात्र हरिदास ॥६३॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — भगवद्भक्त के पहले ‘मलूक’ नाम के दास होते हैं,
और तभी जीव को मोक्ष मिलता है, शास्त्र इस बात को कहता है।


📜 64

दोहा:
तुलसी बिन नहिं हरि-भजन-अधिकारी हो जीव ।
कह मलूक अति श्रेष्ठ है तुलसी भूषितग्रीव ॥६४॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — बिना तुलसी के हरि भजन योग्य नहीं होता जीव,
और तुलसी को विशेष स्थान प्राप्त है, जो ‘मलूक’ के गले की माला है।


📜 65

दोहा:
जिमि सब वेदन बीच है सामवेद शिरताज ।
तिमि मलूक सब मंत्र महँ राममंत्र अधिराज ॥६५॥

अर्थ:
सभी वेदों में सामवेद का विशेष स्थान है।
‘मलूक’ कहते हैं — सभी मंत्रों में राम मंत्र सर्वोच्च है।


📜 66

दोहा:
धर्म —
एक धर्म ही जात है मरे जीव के साथ ।
अन्य ‘मलूका’ नष्ट हों सब शरीर के साथ ॥६६॥

अर्थ:
जीव के साथ एक ही धर्म जन्म लेता है,
‘मलूक’ कहते हैं — अन्य सब शरीरों के साथ नष्ट हो जाते हैं।


📜 67

दोहा:
चतुर वर्ण महँ होत है ब्राह्मण यथा महान् ।
सब महॅं वैष्णव धर्म तिमि महत् ‘मलूक’ बखान ॥६७॥

अर्थ:
चतुर्वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण सबसे महान होता है,
‘मलूक’ कहते हैं — वैष्णव धर्म भी इसी प्रकार महान है।


📜 68

दोहा:
विष्णु-भक्त कहँ जे कहहिं कह ‘मलूक’ दुर्वाक्य ।
परहिं नरक सुखहीन ह्वै कहत शास्त्र अस वाक्य ॥६८॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — जो विष्णु भक्तों के खिलाफ बुरी बातें कहें,
उनका नरक में सुखहीन होने का शास्त्र में वर्णन है।


📜 69

दोहा:
परहित सम कोउ धर्म नहिं हिंसा सम नहिं पाप ।
धर्म करहिं वैष्णव सदा कह ‘मलूक’ नहिं पाप ॥६९॥

अर्थ:
परहित से बढ़कर कोई धर्म नहीं, और हिंसा से बढ़कर कोई पाप नहीं,
वैष्णव धर्म करता है परहित, इसलिए ‘मलूक’ कहते हैं — इसमें पाप नहीं।


📜 70

दोहा:
इन्द्रादिक सब देव अरु गंगादिक सब तीर्थ ।
कह ‘मलूक’ तहँ वसत हैं जहँ वैष्णव-पद-तीर्थं ॥७०॥

अर्थ:
इन्द्र और अन्य देवता, गंगा और अन्य तीर्थस्थल,
‘मलूक’ कहते हैं — वहाँ रहते हैं जहाँ वैष्णवों के पदों के तीर्थ हैं।


📜 71

दोहा:
निज वर्णाश्रम-कर्म से अर्चहिं जो सियराम ।
कह ‘मलूक’ सो लहत हैं अक्षय सुख पर-धाम ॥७१॥

अर्थ:
जो अपने वर्ण, आश्रम और कर्म से राम की पूजा करता है,
‘मलूक’ कहते हैं — वह अक्षय सुख वाला परलोक प्राप्त करता है।


📜 72

दोहा:
रामनाम —
कह ‘मलूक’ शतसन्धियुत जर्जर गिरत शरीर ।
भेषज तजि रसवर पियहु नित्य नाम रघुवीर ॥७२॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — हजार युगों से जर्जर हुए शरीर को छोड़कर,
हर दिन राम नाम पीने से रोग नष्ट होते हैं।


📜 73

दोहा:
राम माहिं रमि राहत हूँ राम राम इति नाम ।
कह ‘मलूक’ शिव कहत अस सहसनाम सम राम ॥७३॥

अर्थ:
राम में रमण कर मैं खुश रहता हूँ, राम-राम नाम लेकर।
‘मलूक’ कहते हैं — शिव भी कहते हैं कि ये नाम सहसनाम (सर्वश्रेष्ठ नाम) के समान हैं।


📜 74

दोहा:
रामनाम सम आन नहिं कलि मुँह सुगम उपाय ।
कह ‘मलूक’ योगादि महँ मन नहिं थिर गति पाय ॥७४॥

अर्थ:
कलियुग में राम नाम जैसा कोई आसान और श्रेष्ठ उपाय नहीं है।
‘मलूक’ कहते हैं — योग आदि में मन स्थिर नहीं होता।


📜 75

दोहा:
सन्तोष —
क्यों ‘मलूक’ पचि मरत हो बुरे पेट के हेत ।
राम जीव के जन्मतहि मातथनन पय देत ॥७५॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं — क्यों पेट की बुरी इच्छा से मरते हो?
राम जन्म से ही जीव को तृप्ति और पोषण देता है।


📜 76

दोहा:
अजगर करै न चाकरी पक्षी करै न काम ।
‘दास मलूका’ कहत है सब के दाता राम ॥७६॥

अर्थ:
साँप सेवा नहीं करता, पक्षी काम नहीं करते,
पर ‘मलूक’ का दास कहते हैं कि राम सबके दाता हैं।


📜 77

दोहा:
भक्ति —
कर्म-योगहू व्यर्थ हो ज्ञान-योग हो रोग ।
कह ‘मलूक’ हरि-भक्ति बिन मिटै न भवको भोग ॥७७॥

अर्थ:
कर्म योग व्यर्थ है, ज्ञान योग रोग जैसा है,
‘मलूक’ कहते हैं — हरि भक्ति के बिना संसार का दुःख मिटता नहीं।


📜 78

दोहा:
एक अनन्या भक्ति महँ मुक्ति-दान की शक्ति ।
कहत ‘मलूका’ सन्त जन नव प्रकार की भक्ति ॥७८॥

अर्थ:
एक अनन्य भक्ति में मुक्ति का वरदान है,
‘मलूक’ कहते हैं — संत जन नव प्रकार की भक्ति करते हैं।


📜 79

दोहा:
नवधा भक्ति —
श्रीसीतापति चरित का श्रवण प्रेम से मान ।
कहत ‘मलूका’ प्रथम यह ‘श्रवणभक्ति’ उर आन ॥७९॥

अर्थ:
नवधा भक्ति में सबसे पहले श्री सीतापति के चरित्र का प्रेमपूर्वक श्रवण है,
‘मलूक’ कहते हैं — यह प्रथम भक्ति है।


📜 80

दोहा:
नाम सहित रघुनाथ का प्रेम सहित गुणगान ।
कहत ‘मलूका’ दूसरी ‘कीर्तन भक्ति’ सुजान‌ ॥८०॥

अर्थ:
नाम और प्रेम सहित रघुनाथ का गुणगान करना,
‘मलूक’ कहते हैं — यह दूसरी भक्ति है, जिसे कीर्तन भक्ति कहते हैं।


दोहा ८१

सुमिरन भक्ति कहत हैं तीसरि सुनहु मलूक ।
निशिदिन हरि-गुण-धाम का सुमिरन करै अचूक ॥

अर्थ:
‘मलूक’ कहते हैं कि सच्ची भक्ति का तीसरा प्रकार है सुमिरन — अर्थात् हर दिन और रात भगवान हरि के गुणों का निरंतर स्मरण करना। यह सबसे प्रभावशाली भक्ति है।


दोहा ८२

दशरथनृप-सुत-चरण-रज जड़हिं करै चैतन्य ।
सोइ ‘पद-सेवन-भक्ति’ है चौथि ‘मलूका’ धन्य ॥

अर्थ:
दशरथ के पुत्र श्रीराम के चरणों की धूल को आत्मसात करने में जीवंत चैतन्य उत्पन्न होता है। इस प्रकार की ‘पद-सेवन-भक्ति’ चौथा प्रकार है, जिसे मलूक धन्य कहते हैं।


दोहा ८३

कौशल्या के लाल की बहुविधि अर्चा जोय ।
पश्चम ‘अर्चन’ नाम सो भक्ति ‘मलूका’ होय ॥

अर्थ:
कौशल्या के पुत्र श्रीराम की अनेक विधियों से पूजा की जाती है, जिसे ‘अर्चन’ कहते हैं। मलूक के अनुसार यह पूजा भक्ति का पाँचवाँ रूप है।


दोहा ८४

षष्ठी ‘वन्दन’ भक्ति है कह ‘मलूक’ स्वर ऊँच ।
प्रभु-पद-वन्दन-भक्ति है सब यज्ञन से ऊँच ॥

अर्थ:
छठे प्रकार की भक्ति ‘वन्दन’ है, अर्थात् प्रभु के चरणों को नमन करना। मलूक कहते हैं कि यह सभी यज्ञों से भी श्रेष्ठ है।


दोहा ८५

भक्ति सप्तमी रामकी दास्य नाम की होय ।
कह ‘मलूक’ हरि-दास बिन नहिं तारत कुल कोय ॥

अर्थ:
सातवें प्रकार की भक्ति ‘दास्य’ है, जिसमें भक्त स्वयं को भगवान राम का दास समझता है। मलूक कहते हैं कि बिना हरि दासत्व के कोई उद्धार नहीं।


दोहा ८६

बन्धु सदृश व्यवहार कहँ नर सम देखन हेत ।
‘सख्य भक्ति’ अष्टम करहिं जन ‘मलूक’ करि चेत ॥

अर्थ:
आठवें प्रकार की भक्ति ‘सख्य’ है, जिसमें भक्त भगवान को मित्र समान देखता है। मलूक कहते हैं कि यह भक्ति भी अत्यंत मूल्यवान है।


दोहा ८७

‘आत्मसमर्पण’ करत जन छॉडि सकल विध कर्म ।
जिमि जटायु तिमि नवम यह भक्ति ‘मलूका’ मर्म‌ ॥

अर्थ:
नवां प्रकार की भक्ति ‘आत्मसमर्पण’ है, जिसमें व्यक्ति समस्त कर्म त्यागकर प्रभु को अपना आत्म समर्पित करता है। जटायु जैसे भक्त इसका सार हैं।


दोहा ८८

श्रवण भक्ति लवकुश करे वाल्मीकि गुणगान ।
कह ‘मलूक’ सुमिरण करे कुम्भज शिष्य सुजान ॥

अर्थ:
श्रवण की भक्ति (भगवान के गुणों को सुनना) लव-कुश करते थे, वाल्मीकि भगवान की महिमा गाते थे, मलूक कहते हैं कि सुमिरण की भक्ति कुम्भज और उनके ज्ञानी शिष्य करते हैं।


दोहा ८९

भरत भावयुत चरणरत शबरी अर्चन जान ।
कह ‘मलूक’ वन्दन पुनः वन्द्य विभीषण मान ॥

अर्थ:
भरत भगवान के चरणों में भाव से लीन थे, शबरी उनकी पूजा करती थी। मलूक कहते हैं कि पुनः वंदन और सम्मान विभीषण को दिया जाता है।


दोहा ९०

श्री मारुत-सुतदास अरु सखा भये कपिराज ।
स्वात्मार्पक तु ‘मलूक’ है श्री जटायु खगराज ॥

अर्थ:
श्री हनुमान और कपि राज (हनुमान) भगवान के सेवक और सखा बने। मलूक कहते हैं कि अपने आप को समर्पित करने में जटायु श्रेष्ठ हैं।


दोहा ९१

प्रपत्ति
एक बारहू शरण हित तव हूँ इमि जो याच ।
कह ‘मलूक’ श्रीराम तेहि अभय करें यह साँच ॥

अर्थ:
मलूक कहते हैं — मैं आपके एक बार फिर से शरणागत होकर आपका हित चाहता हूँ, और श्रीराम मुझे अवश्य अभय देंगे।


दोहा ९२

गुरुदेव
जेहि से सब ब्रह्माण्ड यह कह मलूक हैं व्याप्त ।
तेहि हरि दर्शक गुरु बिना सुख न कहत जन आप्त ॥

अर्थ:
मलूक कहते हैं कि जिसके द्वारा यह समस्त ब्रह्माण्ड व्याप्त है, वही हरि के दर्शन कराने वाला गुरु है। गुरु के बिना कोई सुख प्राप्त नहीं करता।


दोहा ९३

कह ‘मलूक’ जो भजत है सद्गुरु अरु भगवान् ।
सोई जानै तत्त्व जो कहते वेद पुरान ॥

अर्थ:
मलूक कहते हैं जो सद्गुरु और भगवान दोनों का भजन करता है, वही वेदों और पुराणों के तत्त्वों को जानता है।


दोहा ९४

त्रय रहस्य अरु तत्त्वत्रय पञ्श्च अर्थ का ज्ञान ।
कह मलूक गुरु से लहहु जो चाहहु कल्याण ॥

अर्थ:
तीन रहस्य और तीन तत्त्वों तथा पाँच अर्थों का ज्ञान प्राप्त करना हो तो मलूक कहते हैं कि गुरु से ही कल्याण मिलेगा।


दोहा ९५

चार सम्प्रदाय —
जानहु श्री सनकादि अरु ब्रह्मा रुद्र उदार ।
कह ‘मलूक’ वैदिक यही सम्प्रदाय हैं चार ॥

अर्थ:
मलूक कहते हैं कि सनकादि ऋषि, ब्रह्मा, और रुद्र द्वारा स्थापित ये चार वैदिक सम्प्रदाय हैं।


दोहा ९६

रामानन्दाचार्य जी श्री के शुभ आचार्य ।
कह ‘मलूक’ सनकादि के हैं (श्री) निम्बार्काचार्य ॥

अर्थ:
रामानन्दाचार्य जी श्री के शुभ आचार्य हैं, और मलूक के अनुसार सनकादि सम्प्रदाय के हैं निम्बार्काचार्य।


दोहा ९७

कह ‘मलूक’ श्री ब्रह्म के हैं श्री मध्वाचार्य।
विष्णु स्वामि श्री रुद्र के सम्प्रदाय-आचार्य ॥

अर्थ:
मलूक कहते हैं कि ब्रह्मा सम्प्रदाय के आचार्य मध्वाचार्य हैं, विष्णु सम्प्रदाय के स्वामी, और रुद्र सम्प्रदाय के आचार्य हैं।


दोहा ९८

गुरुपरम्परा-प्रणाम
श्री सीतापति आदि मँह मध्यम रामानन्द ।
कह ‘मलूक’ निज-गुरुन कहँ प्रणमहु सदा अमन्द ॥

अर्थ:
मलूक कहते हैं कि श्री सीतापति आदि, मध्यम और रामानन्द हैं गुरु परम्परा। हमेशा अपने गुरु को प्रणाम करें।


दोहा ९९

कल्याणोपदेश
परिशीलहु भाष्यादि श्री सम्प्रदाय के ग्रन्थ ।
कह ‘मलूक’ भव-तरन का इहै अकण्टक पन्थ ॥

अर्थ:
मलूक कहते हैं कि सम्प्रदाय के ग्रन्थों और भाष्यों का अध्ययन करें। यही पन्थ संसार के बंधनों से मुक्ति दिलाता है।


दोहा १००

कह ‘मलूक’ यहि देह से यदि चाहहु कल्यान ।
सन्त-संग अरु करिय नित सिय सियपतिका ध्यान ॥

अर्थ:
मलूक कहते हैं कि यदि इस देह से कल्याण चाहिए तो सद्गति के लिए संतों का संग करें और माता सीता के सतत स्मरण में लीन रहें।


दोहा १०१

श्री सीतापति कृपा से शतक कह्यों सुविचारि ।
कह ‘मलूक’ गुनि भक्ति करि लहहु भव्य फल चारि ॥

अर्थ:
मलूक कहते हैं कि श्री सीतापति की कृपा से यह शतक मैंने बड़े विचार से कहा। गुणी भक्ति करके आप चारों भव्य फल प्राप्त करें।


निष्कर्ष: मलूक शतक अर्थ सहित

मलूक शतक के दोहों में ‘मलूक दास’ ने भक्ति के विभिन्न रूपों, गुरुपरम्परा, सद्गुरु की महत्ता, और संत संगत का महत्व बड़े सरल शब्दों में स्पष्ट किया है।
यह भक्ति मार्ग का सार प्रस्तुत करता है जो श्रीराम भक्ति और योग के साथ जुड़ा हुआ है। मलूक शतक राम रहस्य दर्शन और परात्पर भगवान श्रीराम का वर्णन करने वाला एक अमूल्य ग्रन्थ है।


🔗 आंतरिक संदर्भ