राम को क्या प्रिय है? — प्रेम की एक अनूठी यात्रा

राम को क्या प्रिय है? कबीर, तुलसी, सूर और निराला की दृष्टि से प्रेम का रहस्य

Lord Rama, Lord Krishna, and Lord Vishnu with Goddess Lakshmi depicted together in a luminous celestial scene, symbolizing the changing context of divine love from Rama to Krishna to Vishnu.
Lord Rama, Lord Krishna, and Lord Vishnu with Goddess Lakshmi — united in luminous harmony, where sunset gold meets celestial blue, embodying eternal balance and divine serenity.

राम को क्या प्रिय है? उन्हें कैसे प्रसन्न किया जाए?

यह प्रश्न नया नहीं है। सदियों से मनुष्य इस प्रश्न के साथ राम की ओर देखता आया है। कभी तपस्या के माध्यम से, कभी यज्ञ और उपासना के माध्यम से, कभी ज्ञान की खोज में और कभी भक्ति के सहारे—मनुष्य ने अलग-अलग मार्गों से यह जानने का प्रयास किया है कि राम को वास्तव में क्या प्रिय है।

वेदों, उपनिषदों, पुराणों और भक्ति-साहित्य में इस प्रश्न के अनेक उत्तर मिलते हैं। अलग-अलग युगों, परंपराओं और भक्तों ने इसे अपने-अपने अनुभव से देखा है।

लेकिन इन उत्तरों को यदि एक साथ रखकर देखा जाए, तो एक अत्यंत सुंदर यात्रा दिखाई देती है—प्रेम की यात्रा

कबीर के यहाँ प्रेम ही ज्ञान बन जाता है।
तुलसीदास के राम के यहाँ प्रेम ही मूल भाव है।
सूरदास के कृष्ण के यहाँ अनन्त भावों में प्रेम सबसे ऊँचा हो जाता है।
और विष्णु की कर्ममय सृष्टि में प्रेम इतना दुर्लभ हो जाता है कि उसकी एक बूँद भी अमृत के समान हो जाती है।

यही इस लेख की यात्रा है—राम को क्या प्रिय है, और सृष्टि के विस्तार के साथ उस प्रेम का अर्थ कैसे बदलता दिखाई देता है।


1. कबीर: प्रेम ही ज्ञान है

इस यात्रा की शुरुआत कबीर से होती है।

कबीर कहते हैं:

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोइ।
एकै आखर प्रेम का, पढ़े सु पंडित होइ॥

कबीर के लिए केवल शास्त्र पढ़ लेना ज्ञान नहीं है। ज्ञान तब पूर्ण होता है जब वह मनुष्य को उस सत्य तक पहुँचा दे जिसे वह बाहर खोज रहा है, जबकि वह उसके भीतर ही विद्यमान है।

इसीलिए कबीर कहते हैं:

कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढ़े बन माहि।
ऐसें घटि घटि राम हैं, दुनिया देखै नाहि॥

राम बाहर खोजने की वस्तु नहीं हैं। वे घट-घट में विद्यमान हैं।

अपने भीतर के राम को पहचानना और फिर उसी राम को सबमें देखना—यही वह दृष्टि है जिसे कबीर प्रेम कहते हैं।

इसलिए कबीर के यहाँ प्रेम और ज्ञान दो अलग-अलग वस्तुएँ नहीं हैं।

प्रेम ही वह ज्ञान है जो जीव को उसके मूल से जोड़ देता है।


2. तुलसीदास: राम को केवल प्रेम प्यारा है

कबीर बताते हैं कि प्रेम क्या करता है—वह भीतर छिपे राम को पहचानने की दृष्टि देता है।

तुलसीदास इसके बाद एक और सीधा प्रश्न सामने रखते हैं:

राम को क्या प्रिय है?

उत्तर है:

रामहि केवल प्रेमु पिआरा।
जानि लेउ जो जान निहारा॥

राम को केवल प्रेम प्रिय है।

लेकिन यहाँ “केवल” शब्द को समझना बहुत महत्वपूर्ण है।

राम के लिए प्रेम किसी दूसरे भाव से ऊपर रखा गया भाव नहीं है। वहाँ किसी दूसरे भाव के साथ तुलना की ही आवश्यकता नहीं है—क्योंकि मूल अवस्था में प्रेम के अतिरिक्त दूसरा भाव है ही नहीं।

रामचरितमानस में शिव कहते हैं:

हरि ब्यापक सर्बत्र समाना।
प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥

और राम रहस्य की दृष्टि से राम उस परम अवस्था के प्रतीक हैं जो कार्य और कारण दोनों से परे है:

एष रामः परं ब्रह्म कार्यकारणतः परम्।
चराचरजगत्स्वामी न मानुषवपुर्धरः॥

जहाँ कार्य और कारण अभी प्रकट नहीं हुए, वहाँ उनके आधार पर उत्पन्न होने वाले विविध भाव भी कहाँ से आएँगे?

न कोई विस्तृत कर्म-संसार है, न संबंधों की विविधता, न अनन्त भावों का खेल।

वहाँ प्रेम ही मूल भाव है।

इसीलिए शबरी के बेर का प्रसंग किसी तुलना का प्रसंग नहीं है। राम यह नहीं तौल रहे कि शबरी के बेर किसी दूसरे भोजन से अच्छे हैं या बुरे।

प्रेम है—इसलिए राम बेर स्वीकार करते हैं।

यही “रामहि केवल प्रेमु पिआरा” का रहस्य है।


3. सूरदास: अनन्त भावों में प्रेम सबसे ऊँचा

कृष्ण की अवस्था में सृष्टि का विस्तार हो चुका है।

अब अनन्त संबंध हैं। अनन्त भाव हैं। अनन्त प्रकार की भक्ति है।

ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः।
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्॥

कृष्ण उस अवस्था को व्यक्त करते हैं जहाँ कारणों की अनन्तता और उनके साथ जुड़े अनन्त भाव प्रकट होते हैं।

अब प्रेम अकेला भाव नहीं है।

सख्य है।
वात्सल्य है।
दास्य है।
माधुर्य है।
शान्त भाव है।
और भगवान के साथ विरोध का संबंध भी लीला में अपना स्थान रख सकता है।

इसलिए कृष्ण की इस अवस्था में प्रेम को “एकमात्र भाव” कहा ही नहीं जा सकता।

लेकिन फिर प्रश्न आता है:

इन अनन्त भावों में सबसे ऊँचा कौन है?

सूरदास का उत्तर है:

सबसे ऊँची प्रेम सगाई।
दुर्योधन की मेवा त्यागी, साग विदुर घर खाई॥

यहाँ एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है।

राम के यहाँ प्रेम मूल है।

कृष्ण के यहाँ अनन्त भाव प्रकट हो चुके हैं, इसलिए अब तुलना संभव है।

दुर्योधन के यहाँ राजसी मेवा है।
विदुर के यहाँ साधारण साग है।

कृष्ण दुर्योधन का मेवा छोड़कर विदुर के घर का साग खाते हैं।

यहाँ प्रेम केवल उपस्थित नहीं है; वह दूसरे विकल्पों के ऊपर चुना जाता है।

यही सूरदास का “सबसे ऊँची” कहना है।

राम में प्रेम मूल है।
कृष्ण में प्रेम अनेक भावों में सबसे ऊँचा है।


4. निराला: कर्ममय संसार में प्रेम की एक बूँद

अब हमारी यात्रा विष्णु की अवस्था तक पहुँचती है।

यहाँ सृष्टि केवल अनन्त भावों की लीला नहीं रह जाती। यह कार्य और कर्म की विशाल व्यवस्था बन चुकी है।

विष्णु पुराण कहता है:

विष्णोः सकाशादुद्भूतं जगत्तत्रैव च स्थितम्।
स्थितिसंयमकर्ताऽसौ जगतोऽस्य जगच्च सः॥

यह जगत विष्णु से उत्पन्न है, उन्हीं में स्थित है और उसकी स्थिति तथा लय के कर्ता भी वही हैं।

राम—कार्य और कारण से परे।

कृष्ण—सर्वकारणकारणम्।

विष्णु—सभी कार्यों के कर्ता, कार्य-ब्रह्म।

अब संसार कर्म से भर गया है।

मनुष्य को काम करना है।
परिवार चलाना है।
जीवन की जिम्मेदारियाँ निभानी हैं।
समाज में अपनी भूमिका निभानी है।

और यह कर्म भी उसी भगवान की दी हुई व्यवस्था का हिस्सा है।

इसी पृष्ठभूमि में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता ‘प्रियतम’ एक अत्यंत सुंदर रहस्य खोलती है।

नारद भगवान का निरंतर नाम लेते हैं। लेकिन भगवान जिस साधारण किसान को अपना प्रियतम बताते हैं, वह दिनभर अपने कर्म में लगा रहता है और फिर भी भगवान को भूलता नहीं।

काम करता हुआ नाम जो वह लेता है,
इसी से है प्रियतम।

यहाँ स्थिति राम और कृष्ण दोनों से अलग है।

राम की अवस्था में प्रेम के साथ तुलना नहीं थी।

कृष्ण की अवस्था में अनन्त भावों के बीच तुलना संभव हुई और प्रेम सबसे ऊँचा सिद्ध हुआ।

लेकिन विष्णु की कर्ममय सृष्टि में प्रेम इतना दुर्लभ हो गया है कि तुलना की बात ही नहीं रह जाती।

प्रश्न यह नहीं रह जाता:

प्रेम दूसरे भावों से ऊँचा है या नीचा?

प्रश्न केवल इतना है:

प्रेम मिल जाए—यही बहुत है।

मनुष्य को भगवान ने कर्म दिया है। उसी कर्म में वह इतना व्यस्त है कि भगवान को याद करने के लिए भी समय नहीं बचता। ऐसे में कोई अपने दिए हुए कर्म को करते हुए भी एक क्षण भगवान को याद कर ले, उनका नाम ले ले, उन्हें भूलने न दे—

वही पर्याप्त है।

इसीलिए भगवान विष्णु भाव के इतने भूखे हैं कि प्रेम की एक-एक बूँद उनके लिए अमृत के समान है।


राम को क्या प्रिय है? प्रेम की तीन अवस्थाएँ

इन चारों कवियों की दृष्टियों को एक साथ रखें तो प्रेम की एक अद्भुत यात्रा दिखाई देती है।

राम

प्रेम ही मूल है।

वहाँ प्रेम के साथ तुलना नहीं है, क्योंकि प्रेम के अतिरिक्त दूसरा भाव ही नहीं है।

शबरी के बेर प्रेम के कारण स्वीकार होते हैं। बस।

कृष्ण

प्रेम अनेक भावों में सबसे ऊँचा है।

अब अनन्त भाव हैं, इसलिए तुलना संभव है।

दुर्योधन का मेवा छोड़कर विदुर का साग चुनना प्रेम की श्रेष्ठता को प्रकट करता है।

विष्णु

प्रेम दुर्लभ है।

कार्य और कर्म से भरी हुई सृष्टि में मनुष्य के पास प्रेम के लिए समय बहुत कम रह गया है।

इसलिए तुलना की कोई बात ही नहीं रह जाती।

जो प्रेम मिल जाए, वही पर्याप्त है।

और जो अपना कर्म करते हुए भी भगवान को याद कर ले—

“इसी से है प्रियतम।”


राम से कृष्ण और कृष्ण से विष्णु: प्रेम का बदलता संदर्भ

इसलिए इन तीनों में कोई विरोध नहीं है।

राम को केवल प्रेम प्यारा है।

कृष्ण को अनन्त भावों में प्रेम सबसे ऊँचा प्यारा है।

विष्णु को कर्ममय संसार में प्रेम की एक बूँद भी अमृत के समान प्रिय है।

प्रेम नहीं बदलता।

सृष्टि का संदर्भ बदलता है।

जहाँ कुछ भी प्रकट नहीं हुआ था, वहाँ प्रेम मूल भाव था।

जहाँ अनन्त भाव प्रकट हुए, वहाँ प्रेम सर्वोच्च भाव हुआ।

और जहाँ अनन्त कर्मों से संसार भर गया, वहाँ प्रेम दुर्लभ हो गया—इसलिए उसकी एक बूँद भी अमृत बन गई।

यही दृष्टि राम रहस्य की उस व्यापक संरचना से भी जुड़ती है जिसमें राम को मूल और उनसे प्रकट होने वाली सृष्टि को क्रमशः विस्तृत अवस्थाओं में देखा जाता है। इस संबंध को विस्तार से समझने के लिए Ram Rahasya Equation को भी पढ़ा जा सकता है।

शायद यही कारण है कि राम को पाने के लिए संसार छोड़ना आवश्यक नहीं है।

संसार के कर्म करते हुए भी उन्हें याद किया जा सकता है।

और शायद कार्य-ब्रह्म की इस विशाल सृष्टि में भगवान के लिए यही सबसे बड़ा उपहार है—

आपने अपना काम किया, लेकिन उन्हें नहीं भुलाया।

राम में प्रेम मूल है।
कृष्ण में प्रेम की श्रेष्ठता प्रकट होती है।
विष्णु में प्रेम की दुर्लभता उसका मूल्य प्रकट करती है।

जय सियाराम।
जय राधेश्याम।
जय लक्ष्मीनारायण।

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