🕉️ अष्टाक्षर श्रीराम मन्त्रस्तोत्रम् — एक भावपूर्ण परिचय
“श्रीरामः शरणं मम”—यह अष्टाक्षर मंत्र केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि जीवात्मा की परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण की गहन घोषणा है। राम रहस्य दर्शन के इसी भाव को मूर्त रूप देने वाला यह दिव्य स्तोत्र है: अष्टाक्षर श्रीराम मन्त्रस्तोत्रम् ।
यह स्तोत्र परमेश्वर भगवान नारायण द्वारा देवी लक्ष्मी को उपदेश स्वरूप बताया गया है। इस वाचिक संवाद को श्रोता के रूप में बृहद् ब्रह्मसंहिता ने आत्मसात किया और उसे श्रुतिवंश में अंकित किया गया। अतः यह स्तोत्र न केवल भक्ति का वाक्य है, बल्कि आर्ष ज्ञान और शास्त्रीय उपदेश की अभिव्यक्ति भी है।
🌿 प्रमुख विशेषताएं:
- प्रत्येक श्लोक श्रीराम के किसी विशेष रूप, लीला या गुण का वर्णन करता है।
- हर श्लोक का अंत “श्रीरामः शरणं मम” से होता है—जो शरणागति का मंत्र है।
- यह स्तोत्र श्रीराम के निराकार ब्रह्म, साकार अवतार, और धर्मस्थापक राजा के स्वरूपों को समग्रता में प्रस्तुत करता है।
- इसके पाठ से भवबन्धन से मुक्ति और रामपद की प्राप्ति संभव होती है—ऐसा अंतिम श्लोकों में स्वयं नारायण कहते हैं।
✨ यह स्तोत्र भक्त के लिए एक साधना-पथ, चिंतन और ध्यान का साधन बन जाता है, और उसे श्रीराम की करुणा में डुबो देता है।
🕉️ अष्टाक्षर श्रीराम मन्त्रस्तोत्रम् — मूल श्लोक और भावार्थ
इस खंड में अष्टाक्षर श्रीराम मन्त्रस्तोत्रम् के प्रत्येक श्लोक को उसके मूल रूप में प्रस्तुत कर उनके संक्षिप्त भावार्थ से सजाया गया है। यह अनुभाग भक्तों को श्रीराम के विविध लीलाओं और तात्त्विक स्वरूप को सहजता से अनुभव करने में सहायक है।
१
स सर्वं सिद्धिमासाद्य ह्यन्ते रामपदं व्रजेत् । चिन्तयेच्चेतसा नित्यं श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: सभी सिद्धियाँ प्राप्त करने के बाद भी मनुष्य का अंतिम लक्ष्य श्रीराम के चरण ही होते हैं। उन्हें सदैव मन से स्मरण करना चाहिए।
२
विश्वस्य चात्मनोनित्यं पारतन्त्र्यं विचिन्त्य च । चिन्तयेच्चेतसा नित्यं श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: समस्त सृष्टि में आत्मा ईश्वर की सत्ता पर निर्भर है—इस तथ्य का चिंतन करते हुए श्रीराम को शरण मानें।
३
अचिन्त्योऽपि शरीरादेः स्वातन्त्र्येनैव विद्यते । चिन्तयेच्चेतसा नित्यं श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: शरीर से परे आत्मा का स्वभाव अचिन्त्य होते हुए भी उसमें ईश्वर की स्वतंत्रता मौजूद है। इसका स्मरण करें।
४
आत्माधारं स्वतन्त्रं च सर्वशक्तिं विचिन्त्य च । चिन्तयेच्चेतसा नित्यं श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: आत्मा जो सबका आधार है, वह स्वतंत्र और सर्वशक्तिमान श्रीराम की ही अभिव्यक्ति है—उनके चरणों में आश्रय लें।
५
नित्यात्म गुण संयुक्तो नित्यात्मतनुमण्डितः । नित्यात्मकेलिनिरतः श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: श्रीराम नित्य आत्मा के साथ पवित्र गुणों से युक्त हैं और उसकी लीलाओं में रमण करते हैं।
६
गुणलीलास्वरूपैश्च मितिर्यस्य न विद्यते । अतो वाङ्मनसा वेद्यः श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: श्रीराम के गुण और लीला की कोई सीमा नहीं है, वे वाणी और मन से परे हैं—उन्हें केवल श्रद्धा से अनुभव किया जा सकता है।
७
कर्ता सर्वस्य जगतो भर्ता सर्वस्य सर्वगः । आहर्ता कार्यजातस्य श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: श्रीराम सृष्टि के कर्ता, पालनकर्ता और कार्यों के कारण हैं—हर दिशा में व्यापक हैं।
८
वासुदेवादिमूर्तीनां चतुर्णां कारणं परम् । चतुर्विंशति मूर्तीनां श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: वे वासुदेव आदि चार रूपों तथा चौबीस विष्णु मूर्तियों के परम कारण हैं—सभी उनके अंश हैं।
९
नित्यमुक्तजनैर्जुष्टो निविष्टः परमे पदे । पदं परमभक्तानां श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: श्रीराम परात्पर पद में स्थित हैं, जहाँ नित्य मुक्तजन उन्हें प्रेमपूर्वक सेवा देते हैं—वही भक्तों का परम ध्येय है।
१०
महदादिस्वरूपेण संस्थितः प्राकृते पदे । ब्रह्मादिदेवरूपैश्च श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: वे महत्तत्त्व और अन्य देव रूपों में प्रकृति के पद में स्थित होकर सबका मार्गदर्शन करते हैं।
११
मन्वादिनृपरूपेण श्रुतिमार्गं बिभर्ति यः । यः प्राकृतस्वरूपेण श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: श्रीराम मनु आदि राजाओं के रूप में प्रकट होकर वेदमार्ग की रक्षा करते हैं—वे सभी प्राकृत रूपों में विराजमान हैं।
१२
ऋषिरूपेण यो देवो वन्यवृत्तिमपालयत् । योऽन्तरात्मा च सर्वेषां श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: वे ऋषि रूप में वनवासी जीवन अपनाकर धर्म की रक्षा करते हैं और सबके अंतरात्मा में निवास करते हैं।
१३
योऽसौ सर्वतनुः सर्वः सर्वनामा सनातनः । आस्थितः सर्वभावेषु श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: श्रीराम संपूर्ण शरीरों में विद्यमान, समस्त नामों से पुकारे जाने वाले सनातन ब्रह्म हैं—वे सब भावों में स्थित हैं।
१४
बहिर्मत्स्यादिरूपेण सद्धर्ममनुपालयन् । परिपाति जनान्दीनान् श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: मत्स्य आदि अवतारों में प्रकट होकर वे धर्म की रक्षा करते हैं और दीनों की सहायता करते हैं।
१५
यश्चात्मानं पृथक्कृत्य भावेन पुरुषोत्तमः । आर्चायामास्थितो देवः श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: श्रीराम परम पुरुषोत्तम हैं, जो आर्चा (मूर्ति) रूप में भावानुसार उपस्थित होते हैं।
१६
अर्चावताररूपेण दर्शनस्पर्शनादिभिः । दीनानुद्धरते योऽसौ श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: वे मूर्तिरूप में दर्शन, स्पर्श आदि के द्वारा दीनों का उद्धार करते हैं—उनकी शरण ही कल्याणकारी है।
१७
कौशल्या शुक्तिसंजातो जानकीकण्ठभूषणः । मुक्ताफलसमो योऽसौ श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: वे कौशल्या के गर्भ से जन्मे और जानकी के कंठ के भूषण के समान हैं—मुक्ति के अमूल्य रत्न स्वरूप।
१८
विश्वामित्रमखत्राता ताडकागतिदायकः । अहल्याशापशमनः श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: श्रीराम विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करते हैं, ताड़का का उद्धार करते हैं और अहल्या के शाप को समाप्त करते हैं।
१९
पिनाकभञ्जनः श्रीमान् जानकीप्रेमपालकः । जामदग्न्यप्रतापघ्नः श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: वे पिनाक धनुष को तोड़ने वाले, जानकी के प्रेम के पालक और परशुराम के तेज को शांत करने वाले हैं।
२०
राज्याभिषेकसंहृष्टः कैकेयीवचनात्पुनः । पित्रदत्तवनक्रीडः श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: श्रीराम राज्याभिषेक हेतु प्रसन्न थे, पर कैकेयी के वचनों से वनगमन स्वीकार किया और पिता की आज्ञा से वन क्रीड़ा को अपनाया।
२१
जटाचीरधरो धन्वी जानकीलक्ष्मणान्वितः । चित्रकूटकृतावासः श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: श्रीराम जटा, चीर और धनुषधारी रूप में जानकी और लक्ष्मण के साथ चित्रकूट में वास करते हैं—वही शरणदाता हैं।
२२
महापञ्चवटीलीला सञ्जातपरमोत्सवः । दण्डकारण्य सञ्चारी श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: वे पंचवटी में लीला करते हुए परम आनंद से युक्त होकर दण्डकारण्य में विचरण करते हैं।
२३
खरदूषणविच्छेदी दुष्टराक्षसभञ्जनः । हृतशूर्पनखाशोभः श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: श्रीराम खर-दूषण जैसे राक्षसों का संहार कर दुष्टों को नष्ट करते हैं और शूर्पणखा की अपशोभा हर लेते हैं।
२४
मायामृगविभेत्ता च हृतसीतानुतापकृत् । जानकीविरहाक्रोशी श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: वे मायामृग का भेदन करते हैं, सीता के हरण से दुःखी होकर उसके वियोग में व्याकुल हैं—उनकी करुणा असीम है।
२५
लक्ष्मणानुचरो धन्वी लोकयात्राविडम्बकृत् । पम्पातीरकृतान्वेषः श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: श्रीराम लक्ष्मण के साथ धनुषधारी होकर लोक व्यवहार की विडंबना को दर्शाते हुए पंपा तीर्थ पर सीता की खोज करते हैं।
२६
जटायुगतिदाता च कबन्धगतिदायकः । हनुमत्कृतसाहित्य श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: वे जटायु और कबन्ध को गति देते हैं तथा हनुमान द्वारा प्रस्तुत साहित्य (रामकथा) का स्वीकार करते हैं।
२७
सुग्रीवराज्यदः श्रीशो बालिनिग्रहकारकः । अङ्गदाश्वासनकरः श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: श्रीराम सुग्रीव को राज्य प्रदान करते हैं, बाली का वध करते हैं और अंगद को सांत्वना व मार्गदर्शन देते हैं।
२८
सीतान्वेषणनिर्मुक्त हनुमत्प्रमुखव्रजः । मुद्रानिवेशितबलः श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: वे सीता की खोज हेतु हनुमान प्रमुख वानरों का समूह भेजते हैं, और अंगुली मुद्रिका से उनका बल स्थापित करते हैं।
२९
हेलोत्तरितपाथोधिर्बलनिर्धूतराक्षसः । लङ्कादाहकरो धीरः श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: वे समुद्र को साहसपूर्वक पार करते हैं, राक्षसों को पराजित करते हैं और लंका दाह हेतु मार्ग प्रशस्त करते हैं।
३०
रोषसम्बद्धपाथोधिर्लङ्काप्रासादरोधकः । रावणादिप्रभेत्ता च श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: श्रीराम अपने क्रोध से समुद्र को आंदोलित कर लंका के दुर्गों को रोकते हैं और रावण व उसके दल को पराजित करते हैं।
३१
जानकी जीवनत्राता विभीषणसमृद्धिदः । पुष्पकारोहणासक्तः श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: श्रीराम ने जानकी का जीवन रक्षित किया, विभीषण को समृद्धि दी और पुष्प विमान द्वारा अयोध्या लौटे—वे ही अंतिम आश्रय हैं।
३२
राज्यसिंहासनारूढः कौशल्यानन्दवर्द्धनः । नामनिर्धूतनिरयः श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: श्रीराम सिंहासन पर आरूढ़ होकर कौशल्या को आनंद देते हैं; उनका नाम ही नरक का विनाश करता है।
३३
यज्ञकर्ता यज्ञभोक्ता यज्ञभर्तामहेश्वरः । अयोध्यामुक्तिदः शास्ता श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: वे यज्ञ करने वाले, यज्ञ को भोगने वाले और यज्ञ के पालक परमेश्वर हैं—अयोध्या के मुक्तिदाता और धर्मप्रवर्तक हैं।
३४
प्रपठेद्यः शुभं स्तोत्रं मुच्येत भवबन्धनात् । मन्त्रश्चाष्टाक्षरो देवः श्रीरामः शरणं मम ॥ 🪷 भावार्थ: जो इस मंगल स्तोत्र का पाठ करता है, वह भवबन्धन से मुक्त हो जाता है—अष्टाक्षर मंत्र “श्रीरामः शरणं मम” ही उसका मंत्र है।
३५
प्रपन्नसर्वधर्मेभ्यो मामेकं शरणं गतः । पठेन्निदं मम स्तोत्रं मुच्यते भवबन्धनात् ॥ 🪷 भावार्थ: जो सभी धर्मों को छोड़कर केवल मुझे ही शरण मानता है और इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
🌿 अष्टाक्षर श्रीराम मन्त्रस्तोत्रम् – उपसंहार
अष्टाक्षर श्रीराम मन्त्रस्तोत्रम् एक ऐसा आध्यात्मिक स्तोत्र है जो केवल भक्तिपूर्ण स्तुति नहीं, बल्कि रामतत्त्व की ब्रह्म-व्याख्या है। इसमें श्रीराम को चेतन ब्रह्म, लीला पुरुषोत्तम, धर्मरक्षक और करुणासागर के रूप में प्रस्तुत किया गया है। प्रत्येक श्लोक भक्त को श्रीराम के चरणों की ओर उन्मुख करता है और शरणागति का मंत्र—“श्रीरामः शरणं मम”—हर भाव की पूर्णता बन जाता है।
यह स्तोत्र दर्शाता है कि भक्ति का मार्ग केवल श्रद्धा और समर्पण का नहीं, बल्कि ज्ञान, मर्यादा और आत्म-साक्षात्कार का मार्ग भी है। शास्त्रों के इस मौलिक स्त्रोत में श्रीराम का परात्पर स्वरूप जिस भव्यता से उभरता है, वह साधक को भवबन्धन से मुक्त करने में सक्षम है।
🙏🏼 इस स्तोत्र का पाठ न केवल हमें राम से जोड़ता है, बल्कि हमें स्वयं से जोड़ता है—और वह बंधन ही अंतिम मुक्ति की कुंजी है।
श्रीरामः शरणं मम — यही जीवन की परम यात्रा का मंत्र है। 🌸
सहिताओं में राम
🌺 यह श्रेणी उन आलेखों का संग्राहक केंद्र है जो विभिन्न संहिता ग्रंथों में प्रकट हुए श्रीराम के परात्पर परब्रह्म स्वरूप को उद्घाटित करते हैं। परात्पर भगवान श्रीराम निर्गुण-सगुण ब्रह्म के आदिरूप हैं और इस तत्त्व का दर्शन करने वाले तत्त्ववेत्ता ऋषियों द्वारा श्रीराम का वर्णन कई संहिताओं में पढ़ने को मिलता है जो ह्रदय को भक्ति से ओतप्रोत कर देता है। राम रहस्य दर्शन का यह श्रेणी भक्तों को इस परात्पर भक्ति से साक्षात्कार कराने का एक प्रयास है। 👉 श्रेणी देखें: Samhitaon Men Ram 🙏🏼