
निर्विकार का उदय
जब नहीं था काल, ना कोई स्थान था,
नहीं था रूप कोई, और न कोई नाम था।
परमचैतन्य फिर भी था वहां ना विकार था,
वह था अनादि अनंत निराकार था॥

निर्विकार का उदय
जब नहीं था काल, ना कोई स्थान था,
नहीं था रूप कोई, और न कोई नाम था।
परमचैतन्य फिर भी था वहां ना विकार था,
वह था अनादि अनंत निराकार था॥