परात्पर भगवान राम के स्वरूप का वर्णन, जो सगुण साकार और निर्गुण निराकार दोनों है, वेदों और पुराणों का एकमात्र ध्येय है। यह कोई साधारण देव-वंदना नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के अद्वितीय, अद्वैत और अखण्ड ब्रह्मतत्त्व की प्रत्यक्ष घोषणा है।
🌿 पद्मपुराण पातालखंड का उद्घोष – परात्पर भगवान राम
सकस्त्वं पुरुषः साक्षात्प्रकृतेः पर ईर्यसे ।
यः स्वांशकलया विश्वं सृजत्यवति हन्ति च।।
अरूपस्वमशेषस्य जगतः कारणं परम्।
एक एव त्रिधारूपं गृह्णासि कुहकान्वितः ।।
सृष्टौ विधातृरूपस्त्वं पालने स्वप्रभामयः ।
प्रलये जगतः साक्षादहं शर्वाख्यतां गतः।।
पद्मपुराण के पातालखंड में भगवान शिव स्वयं श्रीराम की स्तुति करते हुए कहते हैं कि — “हे प्रभु! आप प्रकृति से परे साक्षात् पुरुष हैं। आप अपनी अंशकलाओं से स्वयं ही इस विश्व की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं। आप अरूप होते हुए, अर्थात निराकार स्वरूप में भी, इस जगत के परम कारण हैं। आप ही एक होते हुए भी सृजन के लिए ब्रह्मा, पालन के लिए विष्णु और संहार के लिए शिवरूप धारण करते हैं।”
इस एक ही श्लोक-समूह में यह स्पष्ट होता है कि भगवान राम कोई पृथक अवतारी पुरुष नहीं, बल्कि स्वयं परमब्रह्म हैं, जो जगत के तीनों कार्यों को त्रिमूर्ति रूप में संपन्न करते हैं।
🌙 परात्पर भगवान राम – सब राम में रमते, और राम सब में रमते हैं
यही राम रहस्य दर्शन (Ram Rahasya Darshan) है — ‘सब राम में रमते हैं और राम सब में रमते हैं।’ इस शाश्वत सत्य को लोमेश संहिता भी प्रतिपादित करती है:
स्थितं रामे जगत्सर्वं रामः सर्वेषु संस्थितः। (अर्थ: संपूर्ण जगत राम में स्थित है, और राम सभी में स्थित हैं।)
ब्रह्मा हों, विष्णु हों, शिव हों — सब श्रीराम के ही स्वरूप हैं, और यही अद्वैत सत्य है कि सृष्टि के कण-कण में वही परात्पर राम रम रहे हैं।
🌼 निष्कर्ष
वेद, उपनिषद, पुराण — सबका मर्म यही है कि यह सम्पूर्ण चराचर विश्व परात्पर भगवान राम में स्थित है और श्रीराम ही इस चराचर विश्व में रमण कर रहे हैं।
जो इसे जान लेता है, वह स्वयं अद्वैत ब्रह्मस्वरूप परात्पर भगवान राम को प्राप्त करता है।