🕉️ शिवकृत श्रीराम स्तव — अध्यात्मरामायण युद्धकाण्ड में परात्पर राम रहस्य

📚 संदर्भ:
यह दिव्य शिवकृत श्रीराम स्तव श्रीमद् अध्यात्मरामायण के युद्धकाण्ड, पंचदशः सर्ग (सर्ग 15) के श्लोक 51 से 63 तक मिलता है।
यह प्रसंग उस समय का है जब भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक हो रहा है। उस राजसभामें सभी देवता उपस्थित हैं, और वहीं भगवान शिव स्वयं श्रीरामचन्द्रजी की यह स्तुति करते हैं — प्रकट रूप में उनके परात्पर ब्रह्म स्वरूप का उद्घोष करते हुए।

शिवकृत श्रीराम स्तव - A digitally rendered celestial sculpture in traditional Indian marble art style, featuring Lord Shri Ram and Mata Sita seated on a throne with divine companions and deities, bathed in golden light and floating among ethereal clouds. This is a Copilot Generated Image.
A luminous vision of Shri Ram, Mata Sita, and divine companions sculpted in radiant white marble—created with Microsoft Copilot for शिवकृत श्रीराम स्तव.

🌺 स्तव का सार

अध्यात्मरामायण केवल श्रीराम के ऐतिहासिक चरित्र को नहीं, बल्कि उनके परात्पर ब्रह्म स्वरूप को प्रतिपादित करता है।
जब लंका विजय के बाद श्रीराम का भव्य राज्याभिषेक होता है, उसी समय महादेवजी माता पार्वती को श्रीराम के ब्रह्मस्वरूप का यह गूढ़ स्तव सुनाते हैं।
यह स्तव सिद्ध करता है कि श्रीराम केवल दशरथनन्दन नहीं, बल्कि आदि-मध्य-अन्त रहित, सगुण-निर्गुण अद्वैत परब्रह्म हैं।


📜 शिवकृत श्रीराम स्तव: मूल श्लोक

श्रीमहादेव उवाच  

नमोऽस्तु रामाय सशक्तिकाय
नीलोत्पल श्यामलकोमलाय ।
किरीटहाराङ्गद भूषणाय
सिंहासनस्थाय महाप्रभाय ॥

त्वमादिमध्यान्तविहीन एकः
सृजस्यवस्यत्सि च लोकजातम् ।
स्वमायया तेन न लिप्यसे त्वं
यत्स्वे सुखेऽजस्ररतोऽनवद्यः ॥

लीलां विधत्से गुणसंवृतस्त्वं
प्रपन्नभक्तानुविधानहेतोः ।
नानावतारैः सुरमानुषाद्यैः
प्रतीयसे ज्ञानिभिरेव नित्यम् ॥

स्वांशेन लोकं सकलं विधाय तं
बिभर्षि च त्वं तदधः फणीश्वरः ।
उपर्यधो भान्वनिलोडुपौषधि-
प्रवर्षरूपोऽवसि नैकधा जगत् ॥

त्वमिह देहभृतां शिखिरूपः
पचसि भुक्तं अशेषमजस्रम् ।
पवनपञ्चकरूपसहायो
जगदखण्डमनेन बिभर्षि ॥

चन्द्रसूर्यशिखिमध्यगतं यत्
तेज ईश चिदशेषतनूनाम् ।
प्राभवत्तनुभृतामिव धैर्यं
शौर्यमायुरखिलं तव सत्त्वम् ॥

त्वं विरिञ्चिशिवविष्णुविभेदात्
कालकर्मशशिसूर्यविभागात् ।
वादिनां पृथगिवेश विभासि
ब्रह्म निश्चितमनन्यदिहैकम् ॥

मत्स्यादिरूपेण यथा त्वमेकः
श्रुतौ पुराणेषु च लोकसिद्धः ।
तथैव सर्वं सदसद्विभाग-
त्वमेव नान्यद्भवतो विभाति ॥

यद्यत्सुसमुत्पन्नमनन्तसृष्टौ-
उत्पत्स्यते यच्च भवच्च यच्च ।
न दृश्यते स्थावरजङ्गमादौ
त्वया विनातः परतः परस्त्वम् ॥

तत्त्वं न जानन्ति परात्मनस्ते
जनाः समस्तास्तव माययातः ।
त्वद्भक्तसेवामलमानसानां
विभाति तत्त्वं परमेकमैशम् ॥

ब्रह्मादयस्ते न विदुः स्वरूपं
चिदात्मतत्त्वं बहिरर्थभावाः ।
ततो बुधस्त्वामिदमेव रूपं
भक्त्या भजन्मुक्तिमुपैत्यदुःखः ॥

अहं भवन्नाम गृणन्कृतार्थो
वसामि काश्यां अनिशं भवान्या ।
मुमूर्षमाणस्य विमुक्तयेऽहं
दिशामि मन्त्रं तव राम नाम ॥

इमं स्तवं नित्यमनन्यभक्त्या
शृण्वन्ति गायन्ति लिखन्ति ये वै ।
ते सर्वसौख्यं परमं च लब्ध्वा
भवत्पदं यान्तु भवत्प्रसादात् ॥

शिवकृत श्रीराम स्तव – भावार्थ एवं व्याख्या

🔹 श्रीराम परात्पर ब्रह्म हैं — वे आदि, मध्य और अंत से रहित हैं। सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार वही करते हैं परंतु माया से लिप्त नहीं होते।

🔹 लीला रूप में सगुण, तत्त्वतः निर्गुण — अवतार लेकर भक्तों की रक्षा करते हैं, पर ज्ञानी उन्हें निर्गुण परब्रह्म रूप में ही जानते हैं।

🔹 भूत, भविष्य और वर्तमान में सर्वव्यापक — सृष्टि में जो कुछ उत्पन्न हुआ, हो रहा या होगा — सबमें वही व्याप्त हैं।

🔹 त्रिदेवों का आधार — ब्रह्मा, विष्णु और शिव — सब उन्हीं के विभिन्न स्वरूप हैं। काल, कर्म, सूर्य-चंद्र का विभाजन भी उन्हीं में समाहित है।

🔹 काशी में मोक्षदायक राम नाम — शिवजी कहते हैं कि वे स्वयं काशी में राम नाम का जप करते हैं और मृत्यु के समय साधकों को यह महामंत्र देकर मुक्त कर देते हैं।


🕉️ शिवकृत श्रीराम स्तव – वेद-वेदांत से संगति

यह स्तोत्र उपनिषदों और अद्वैत वेदान्त के सिद्धांतों को सरल भाषा में पुष्ट करता है —

  • ‘एको देवः सर्वभूतेषु गूढः’ — वही एक देव सर्वत्र गुप्त हैं।
  • कठोपनिषद और माण्डूक्य उपनिषद के ओंकार रहस्य की तरह ही राम नाम में वही परब्रह्म छिपा है।
  • राम लीला सगुण है, पर मूलस्वरूप निर्गुण ब्रह्म ही है — यही अद्वैत है।

🔗 राम रहस्य समीकरण

इस स्तोत्र में ही छिपा है राम रहस्य समीकरण:
सब राम में रमते हैं और राम सब में रमते हैं।
यह शिववाणी सगुण राम से निर्गुण ब्रह्म तक की यात्रा का सिद्ध मंत्र है।


📍 प्रयोग साधक के लिए

✅ इस स्तोत्र का नित्य पाठ करें।
✅ राम नाम का जप करें — यही मोक्ष मंत्र है।
✅ शिवजी द्वारा काशी में प्रदत्त इस स्तोत्र को लिखें, पढ़ें, गायें — यही जीवन का परम साधन है।


🔗 सम्बंधित लिंक

👉 Ram’s Chariot of Victory: The Spiritual Blueprint of Triumph
👉 राम का धर्मरथ: कठोपनिषद् का रथ रूपक और रामचरितमानस का विजय रहस्य


🌟 उपसंहार

शिवकृत श्रीराम स्तव अध्यात्मरामायण में राम के परात्पर ब्रह्म स्वरूप को प्रत्यक्ष करता है।
यह केवल भक्ति नहीं, वेदांत का सार भी है।
इसलिए इसका श्रवण, पाठ और स्मरण साधक के लिए जीवन और मृत्यु — दोनों का मंगलकारी पथ बनाता है।

🌺 जय सियाराम