स्कन्द पुराण का राम रहस्य दर्शन – 4: भगवान राम का आत्मस्वरूप


राम रहस्य दर्शन की हमारी यात्रा में, हमने अब तक भगवान राम के विविध स्वरूपों को समझा है – कैसे वे त्रिदेवों के मूल, विष्णु द्वारा स्तुत्य परब्रह्म और विराट रूप के प्रवर्तक हैं। इस श्रृंखला में आगे बढ़ते हुए, आइए स्कन्द पुराण के गहनतम रहस्यों में से एक का अनावरण करें, जहाँ स्वयं भगवान राम अपने आत्मस्वरूप का विस्तृत वर्णन करते हैं। यह आत्मज्ञान वे किसी और को नहीं, बल्कि अपने ही कार्य-ब्रह्म-स्वरूप भगवान विष्णु को प्रदान करते हैं, जो उनके और विष्णु के एकात्मक संबंध तथा इस उपदेश के परम महत्व को दर्शाता है। यह आत्मस्वरूप ही उनके निराकार, अद्वैत और अखण्ड चैतन्य सत्ता को उद्घाटित करता है।

Copilot-generated divine image of भगवान राम का आत्मस्वरूप, depicting Paratpar Shri Ram telling about his आत्मस्वरूप to Lord Vishnu.
A Copilot-created vision of भगवान राम का आत्मस्वरूप, where Paratpar Shri Ram reveals his transcendental essence to Lord Vishnu, embodying the infinite, formless source of all creation.

इन श्लोकों में, भगवान राम सीधे अपनी परम पहचान बताते हैं, जो यह स्पष्ट करती है कि वे केवल एक अवतार ही नहीं, बल्कि स्वयं परब्रह्म हैं, जिनसे सम्पूर्ण सृष्टि का उद्भव और विलय होता है।

परात्पर भगवान राम का आत्मस्वरूप दर्शन

भगवान राम अपने आत्मस्वरूप का उद्घाट करते हुए कहते हैं:

अहमात्मा परो नित्यः सन्मात्रो विभुरीश्वरः।
सदसद्भावरहितो भेदाभेदविवर्जितः॥

अर्थ: भगवान राम कहते हैं — मैं ही परमात्मा हूँ, जो परात्पर है, नित्य और अविनाशी है, मात्र ‘सत्’ स्वरूप है — शुद्ध अस्तित्वमात्र। मैं ही सर्वव्यापक और सर्वेश्वर हूँ। मुझमें न तो सत्-असत् के भेद की कोई सत्ता है और न भेद-अभेद की कोई कल्पना। मैं उन सब सीमाओं से परे हूँ।


एकोद्वितीयो विकृतो निराकारो निरञ्जनः।
मच्छक्तितो विश्वमिदं भिन्नाभिन्नतया स्थितम्॥

अर्थ: मैं एकमात्र अद्वितीय परमात्मा हूँ — दूसरा कोई नहीं। मैं विकाररहित, निराकार और निष्कष हूँ। मेरी ही शक्ति से यह सम्पूर्ण जगत भिन्न और अभिन्न — दोनों स्वरूप में स्थित है। जीवों में भिन्नता है, परन्तु उनमें भी मैं ही व्याप्त हूँ, यह अभिन्नता है।


यत्र त्वमन्ये बहवस्तत्त्वानामधिपाः सुराः।
मदंशांशावलम्बेन खे खद्योता इवासते॥

अर्थ: हे विष्णु! जिस विश्व में तुम और अन्य देवगण विविध तत्वों के अधिपति होकर भी मेरे अंश के आश्रित हो — जैसे आकाश में असंख्य जुगनू टिमटिमाते हैं, वैसे ही देवता भी मेरी महाशक्ति के सहारे ही विद्यमान हैं।


अहमेवादिरानन्दो निरालम्बः स्वराट् विभुः।
सर्वः सर्वगतः शान्तः शुद्धश्चैतन्यविग्रहः॥

अर्थ: मैं ही आदि और अनन्त आनन्द स्वरूप हूँ। मेरा कोई आधार नहीं — मैं स्वयंभू, स्वयंप्रकाश, स्वयं-स्वामी और सर्वव्यापक हूँ। मैं ही सर्वस्व हूँ, सर्वत्र व्याप्त हूँ। मैं परम शान्ति हूँ, परम शुद्ध हूँ, और शुद्ध चैतन्यस्वरूप हूँ।


आकाशस्यास्मि चाकाशो दिग्दिशामस्मि शाश्वती।
कालस्यापि महान्कालो ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमम्॥

अर्थ: मैं आकाश का भी आकाश हूँ — जो सबको धारण करता है। मैं दिशाओं का भी सनातन आधार हूँ। मैं काल का भी महाकाल हूँ — सबको ग्रसने वाला। मैं ही ज्योतियों में परम ज्योति हूँ — सूर्य, चन्द्र, अग्नि आदि का भी ज्योतिर्मय स्रोत मैं ही हूँ।


कारणं कारणानां च कारणानामहं मनः।
अणूनां परमाणीयान्महतां च महत्तरः॥

अर्थ: मैं ही सभी कारणों का कारण हूँ। मन का भी कारण मैं ही हूँ। मैं अणुओं से भी सूक्ष्म हूँ और महानों में भी महान हूँ। सूक्ष्म में मैं परमाणु रूप से स्थित हूँ और महा में ब्रह्मांड रूप से प्रकाशित हूँ।


विभुर्विभूनामधिकस्तत्त्वानां तत्त्वमुत्तमम्।
योगो निर्वाणमार्गाणामहमस्मि सनातनः॥

अर्थ: मैं ही सभी विभुओं (सर्वव्यापी सत्ता) में भी अधिक व्यापक हूँ। तत्वों में भी मैं ही सर्वोत्तम तत्व हूँ। मैं ही सनातन योग हूँ — जो निर्वाण का मार्ग देता है, मोक्ष का द्वार खोलता है।


प्राणः प्राणभृतामस्मि दमश्चास्मि तपस्विनाम्।
शान्तिरस्मि मुमुक्षूणां प्रणवोऽस्मि गिरामहम्॥

अर्थ: मैं ही प्राणियों का प्राण हूँ, तपस्वियों में संयम रूप से स्थित हूँ। जो मोक्ष की कामना करते हैं — उनके हृदय की शान्ति भी मैं ही हूँ। और वाणी में जो सर्वोत्तम ध्वनि प्रणव (ॐ) है — वही मैं हूँ।


विधिः क्रियावतामस्मि निवृत्तिरपि योगिनाम्।
दीक्षितानां रतिश्चास्मि विरतिश्च विवेकिनाम्॥

अर्थ: जो कर्मयोगी हैं — उनमें मैं ही विधि (कर्मधर्म) हूँ। जो योगी हैं — उनमें निवृत्ति (वैराग्य) भी मैं हूँ। जो दीक्षित हैं — उनके लिए रति (आस्था) मैं हूँ। और विवेकी साधकों की विरक्ति भी मैं ही हूँ।


महोपनिषदं विष्णो संगृह्य कथयामि ते।
समना संसरिष्णूनामुनमनास्मि मदर्थिनाम्॥

अर्थ: हे विष्णु! मैं यह महोपनिषद — परम रहस्य — तुम्हें सुना रहा हूँ। संसार में चित्त को जो एकरस रखे वही मैं हूँ। और जो मुझमें तल्लीन रहकर केवल मुझे पाने की उत्कट इच्छा रखते हैं — उनकी वह इच्छा भी मैं ही हूँ।


यत्किंचित्परमं लोके तत्तदस्मि जनार्दन।
मया व्याप्तमिदं विष्णो विश्वमव्यक्ततेजसा॥

अर्थ: हे जनार्दन! संसार में जो कुछ भी परम है — वह सब मैं ही हूँ। हे विष्णु! यह सम्पूर्ण विश्व मेरे अव्यक्त तेज से व्याप्त है — प्रकट और अप्रकट सभी रूपों में।


निष्कर्ष: सर्वव्यापी चैतन्य स्वरूप राम

यह राम रहस्य दर्शन हमें सिखाता है कि भगवान राम परिपूर्णतम और श्रेष्ठतम अवतार तो हैं ही, पर वे इन सबसे परे स्वयं परात्पर ब्रह्म का साकार रूप भी हैं। वास्तव में, अवतार और अवतारी में कोई भेद नहीं होता; अवतार अवतारी की ही पूर्ण अभिव्यक्ति है। ये श्लोक उनके निराकार, अद्वैत और अखण्ड चैतन्य स्वरूप को उद्घाटित करते हैं, जो समस्त सृष्टि का आदि, मध्य और अंत है। उनकी उपस्थिति हर कण में है, और उन्हीं से सब कुछ उद्भूत होता है। परात्पर भगवान राम का यह आत्मस्वरूप हमें यह गहरा बोध कराता है कि वे ही हमारे जीवन का परम आधार और अंतिम गंतव्य हैं।


यह उद्धरण स्कन्द पुराण के निर्वाणखंड में वर्णित रामगीता से साभार प्रस्तुत है।


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