रामावतार में विस्मृति – इस प्रश्न का उत्तर राम अवतार के रहस्य में छिपा है। राम अवतार के अनेकों कारण हैं और उन कारणों में विविधता के चलते हरेक बार के अवतार की लीलाएँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं। राम अवतार का मूल प्रभु शिव द्वारा सृष्टि की विभिन्न परिस्थितियों में आदर्शों का अनुसंधान है। ये अनुसंधान आदिशिव द्वारा सृष्टि के आरम्भ में ही प्रारम्भ हुआ था। प्रभु राम का प्राकट्य सबसे पहले महाशिव के मानस में हुआ था। इसके बाद महाशिव का आग्रह ही प्रथम कल्प में राम के स्वयं अवतार लेने का कारण था। यही राम सृष्टि के आरम्भ में विराट महाविष्णु स्वरूप में प्रतिष्ठित हुए। किन्तु महाशिव के मानस में अनन्त ब्रह्मांडों के विकास और विस्तार के मर्यादा की सीमा बने सदा सर्वदा राम ही बसे रहे।
रामावतार में विस्मृति: कल्पभेद और राम का बारंबार अवतरण
कालान्तर में यह सृष्टि अनेक ब्रह्मांडों और अनन्त विस्तार वाली हुयी। महाविष्णु और महाशिव उन अलग-अलग ब्रह्मांडों में अलग-अलग विष्णु और शिव रूपों में प्रविष्ट हुए। काल और परिस्थिति के अनुसार प्रभु ने अनेक अवतार लिए और नाना प्रकार की लीलाएँ की। किन्तु हरेक ब्रह्मांड में अलग-अलग रूपों में आने के बाद भी अपने ब्रह्मांड में घटती उन विभिन्न परिस्थितियों में आदर्श उपस्थित करने के लिए शिव के मानस में राम रूप का ही सन्धान होता रहा। उन अनेक ब्रह्मांडों में शिव के अनुरोध पर बार-बार भगवान विष्णु ने राम का अवतार ग्रहण किया और कल्पभेद से नाना प्रकार की लीलाएँ की। जब जब भगवन विष्णु का अवतरण राम रूप में धरा पर हुआ तब तब रामावतार में विस्मृति प्रभु की लीला की एक अद्वितीय विशेषता रही।
रामावतार में विस्मृति: तुलसीदास द्वारा वर्णित अद्भुत लीला
कहते हैं जब सृष्टि के प्रथम कल्प में साकेतवासी प्रभु राम ने अवतार लिया था और मूल परमा प्रकृति सीता से विवाह के समय अपनी दिव्य लीला का प्रारम्भ किया था तो पूरी चर-अचर सृष्टि इस लोकाभिराम लीला पर विमोहित हो गयी थी। ब्रह्मा, विष्णु और शिव की अवस्था का वर्णन करते हुए तुलसीदास जी ने रामचरितमानस (Page – 351) में लिखा है:
संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे॥
हरि हित सहित रामु जब जोहे। रमा समेत रमापति मोहे॥
निरखि राम छबि बिधि हरषाने। आठइ नयन जानि पछिताने॥
शिवजी को हर्ष था और उन्हें अपनी पंद्रहों आँखें परमप्रिय लग रही थी तो वहीं ब्रह्माजी को हर्ष के साथ केवल आठ आँखों (सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा जी की दस आँखें थी) के होने का पछतावा भी था।
विष्णु स्वरूप का विस्मरण
लेकिन सबसे अद्भुत अवस्था लक्ष्मीजी के साथ भगवान विष्णु की थी। कृपालु भगवान हरि ने जब अपने स्वभाव के अनूरूप कृपावश अपने मूल रूप कृपासमुद्र राम को देखा तो लक्ष्मीजी के साथ मोहित हो गए। यहाँ लक्ष्मीजी के लिए रमा (रमा रूप और नाम का अद्वितीय रहस्य) और विष्णु भगवान के लिए रमापति नामों का प्रयोग अकिंचन नहीं है वरना ऐसा करके तो तुलसीदासजी ने शब्दों के गागर में राम के रम् भाव का सागर ही भर दिया है। अपने मूलरूप का साक्षात्कार कर श्रीहरि की यह अवस्था स्वाभाविक ही है।
अनन्तर यही भगवान विष्णु जब कल्पभेद होने पर अनेक ब्रह्मांडों में अनेकानेक कारणों से (मूल कारण उस ब्रह्माण्ड में भगवान शिव का भगवान विष्णु से राम अवतार ग्रहण कर मर्यादा और आदर्श स्थापित करने का आग्रह) राम का अवतार धारण करते हैं तो अपने मूल रूप में ही रमे रहते हैं। ऐसी अवस्था में, यह मूल राम का मोह नहीं, बल्कि विष्णु के अवतार-भाव का मोह होता है, जिसके कारण वे रामावतार की मानुषी लीला के क्रम में अपने विष्णु स्वरूप से विस्मृत रहते हैं। इस तरह रामावतार में विस्मृति प्रभु की लीला में चरमोत्कर्ष की अवस्था है।
मोह: अनंत लीलाओं का मूल कारण
केवल भगवान विष्णु ही नहीं, सृष्टि में जितने भी विष्णु तत्त्व और विष्णु अवतार हैं उन सबको रामावतार में विस्मृति के कारण कालक्रम में मोह होता है। भगवान विष्णु की अनन्त लीलाओं का मूल कारण भी यही है और सृष्टि में मोह की अनिवार्य उपस्थिति का परम कारण भी यही है। मोह की इस गहन अवधारणा और राम रहस्य इक्वेशन (Ram Rahasya Equation) के भीतर इसकी वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक व्याख्या को और गहराई से समझने के लिए, आप हमारे विस्तृत अंग्रेजी पोस्ट ‘Moh: The Deceptive Convergence in the Ram Rahasya Equation‘ को पढ़ सकते हैं।
उमापति महादेव की जय, सियावर रामचंद्र की जय, रमापति विष्णु की जय
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