माता सती की विस्मृति – सृष्टि के आदिकल्प में जब साकेतवासी प्रभु राम अवतार लेते हैं और सीताहरण के पश्चात् जब राम सीता के वियोग में विह्वल हो विलाप कर रहे होते हैं, तो उनकी मानुषी लीला को देखकर माता सती को भ्रम और सन्देह होता है। इस सन्देह के उपरांत भगवान शिव उन्हें स्पष्ट बताते हैं कि राम कौन हैं। इसके बाद भी माता सती का सन्देह नहीं जाता और वे माता सीता का रूप धारण कर राम की परीक्षा लेने का प्रयास करती हैं। बाद की कहानी तो सबको विदित ही है। माता सती तो स्वयं महामाया हैं, फिर कैसे हुआ उनको ये भ्रम और सन्देह?
श्रीराम का परंब्रह्म स्वरूप
भगवान राम परंब्रह्म के मूल स्वरूप हैं। ये वही आदि स्वरूप हैं जिनके प्रथम दर्शन पर वेद भी सर्वप्रथम स्वीकारते हैं कि इनकी कोई प्रतिमा नहीं है, अर्थात् इनके जैसा कोई नहीं है।
प्रभु का यह स्वरूप सृष्टि के प्रारम्भ की उस अवस्था की है जिस अवस्था में हरि से हर की पृथकता नहीं हुई है, भाव से भव की पृथकता नहीं हुई है। इतना ही नहीं, इस अवस्था में ब्रह्म से माया की भी पृथकता नहीं हुई है। भव, भाव और भवितव्यता से परे हैं राम। यह कैवल्य की अवस्था है जिसमें केवल राम हैं।
माता सती की विस्मृति का कारण
माता सती राम को उस समय देखती हैं जब माता सीता वहाँ नहीं होती हैं। ये प्रभु का वो स्वरूप है जिसमें उनकी माया से कोई पृथकता नहीं है। माया से पृथकता के अभाव की इस अवस्था वाला यह राम रूप माया और मायापति दोनों का आदि स्वरूप है।
गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस के बालकाण्ड में इस प्रसिद्ध प्रसंग का विस्तृत वर्णन मिलता है, जहाँ माता सती को राम की मानुषी लीला को देखकर भ्रम होता है। वस्तुतः, अपने मूल स्वरूप को देख कर माता सती को महामाया होने की अपनी वास्तविकता की विस्मृति हो जाती है और उनके हृदय में राम (जो स्वयं उनका मूल स्वरूप हैं) के प्रति सन्देह जन्म लेता है। ये विस्मृति इतनी बलवती है कि वे सीता का रूप धारण कर राम की परीक्षा लेने पहुँच जाती हैं।
माता सती की विस्मृति: शिव पुराण के अनुसार सती का संवाद और संशय का निवारण
शिव पुराण में माता सती के इस भ्रम और उनके श्रीराम से हुए संवाद का विस्तार से वर्णन है:
रामं विज्ञाय विष्णुं तं स्वरूपं संविधाय च । स्मृत्वा शिवपदं चित्ते सत्युवाच प्रसन्नधीः ॥
श्रीराम को साक्षात् विष्णु जानकर माता सती ने माता सीता का रूप त्याग कर अपना रूप धारण करके मन में शिव के चरणों का चिन्तन करते हुए उनसे कहा।
चतुर्भुजं हरिं त्वां नो दृष्ट्वैव मुदितोऽभवत् । यथेदं रूपममलं पश्यन्नानंदमाप्तवान् ॥
शिव बिना आपके चतुर्भुज रूप को देखे ही आनन्दविभोर हो गए। आपके इस निर्मल रूप को देखकर उन्हें बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ।
तच्छ्रुत्वा वचनं शंभौर्भ्रममानीय चेतसि । तदाज्ञया परीक्षां ते कृतवत्यस्मि राघव ॥
शंभु के वचन को सुनकर मेरे हृदय में भ्रम उत्पन्न हुआ। अतः हे राम! उनकी आज्ञा से मैं आपकी परीक्षा लेने आयी।
ज्ञातं मे राम विष्णुस्त्वं दृष्टा ते प्रभुताऽखिला । निःसशंया तदापि तच्छृणु त्वं च महामते ॥
हे राम! अब मुझे ये ज्ञात हो गया कि आप साक्षात् विष्णु ही हैं। मैंने आपकी अखिल प्रभुता देख ली है। मेरा संशय दूर हो गया है। तो भी हे महामते! आप मेरी बात को सुनिए।
कथं प्रणम्यस्त्वं तस्य सत्यं ब्रूहि ममाग्रतः । कुरु निस्संशयां त्वं मां शमलं प्राप्नुहि द्रुतम् ॥
मुझे यह सच सच बताइए कि आप (इस रूप में) शिव के भी वन्दनीय कैसे हुए। आप (यह बताकर) मेरी जिज्ञासा शान्त कीजिए और मेरा संशय हर लीजिए।
भगवान राम ने अपने अवतार की मर्यादा के अनुरूप और माता सती के मनोनुकूल श्रीशिव द्वारा श्रीविष्णु के गोपवेश वाले द्विभुज रूप के गोपेश पद पर अभिषेक करने की कथा सुनाकर उनके चित्त को शांत किया और माता सती भगवान शिव के पास वापस लौट गईं।
परन्तु भगवान शिव को रामरूप के दर्शनमात्र से जिस परमानन्द की प्राप्ति हुई थी वह छाया माता के मन से (“अजहुँ न छाया मिटति तुम्हारी”) कभी नहीं गयी और अपने सभी प्रश्नों के उत्तर उन्होंने माता पार्वती के रूप मे अपने अगले जन्म में भगवान शिव से प्राप्त किये। माता के अनेकों प्रश्न ही कालान्तर में अनेक रामायणों की रचना के कारण बने।
रामकथा कै मिति जग नाहीं। असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं॥ नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा॥
लीला की आधारशिला: अन्य अवतारों में भी विस्मृति
अन्य कल्पों में भी भगवान विष्णु जब राम का अवतार ग्रहण करते हैं, तब ऐसी ही विस्मृति उनकी मानुषी लीला की आधारशिला बनती है। सती स्वयं पद्मनाभसहोदरी (भगवान विष्णु की बहन) हैं। इन दोनों का अपने मूलरूप राम से सम्बन्ध समान ही है और इनकी विस्मृति (रामावतार में भगवान विष्णु की विस्मृति) का कारण भी समान है। यह विस्मृति दिव्य लीला का एक गूढ़ पहलू है और सृष्टि में मोह की अनिवार्य उपस्थिति का परम कारण भी। मोह की वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक व्याख्या को और गहराई से समझने के लिए, आप हमारे विस्तृत अंग्रेजी पोस्ट ‘Moh: The Deceptive Convergence in the Ram Rahasya Equation‘ को पढ़ सकते हैं।
जय सियाराम, जय उमाशंकर
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