भगवान राम का विराट रूप – राम रहस्य दर्शन की यात्रा में अक्सर यह प्रश्न उठता है: क्या परात्पर भगवान राम ने भी कभी अपने विराट या विश्वरूप का प्रदर्शन किया है, जैसा कि अन्य अवतारों में देखा जाता है? स्कन्द पुराण की रामगीता में इसके स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं, जो भगवान राम के परम और सर्वव्यापी स्वरूप को उद्घाटित करते हैं।
रावण वध के उपरान्त भगवान राम का विराट रूप
भगवान राम अपने मूल स्वरूप में एकात्मक हैं और ईश्वर के अन्य सभी रूप और आकार इसी मूलस्वरूप से निर्गत हैं। स्कन्द पुराण की रामगीता में वर्णित है कि रावणवध के उपरान्त, जब सभी देवता विष्णु भगवान के अवतार के रूप में श्रीराम की स्तुति करते हैं और उन्हें बार-बार कहते हैं कि आपने रावण वध का अपना कार्य पूर्ण कर लिया है, तो भगवान राम के मन में एक विचार आता है:
यथाऽभवं प्रपंचोहं गोपयित्वा निजैकताम्।स्यामेकमेव भूयोद्य अथोत्सृज्य प्रपंचताम्।।
(अर्थात्) (अगर मेरा कार्य पूर्ण हो ही चुका हो तो) जैसे पहले मैं अपनी एकता का गोपन करके सृष्टि-प्रपंचरूप से विस्तार को प्राप्त हुआ था, उसी प्रकार आज पुनः प्रपंचता का उत्सर्ग कर एकत्वभाव में ही परिवर्तित हो जाता हूँ।
ऐसा विचार कर वे विराटरूप में विवर्धित होने लगते हैं तो सारी सृष्टि अपनी स्वतंत्रता खोकर राम के मूलरूप में उपसंहार की तरफ प्रवृत्त होने लगती है, क्योंकि भवपाश के बन्धन को बनाने वाले श्रीराम स्वयं ही भवपाश का मोचन कर कैवल्य देने वाले परब्रह्म राम भी हैं।
इत्यखण्डचिदानन्दस्वरूपावेशवृंहितः।ववृधे परमाकाशो विश्वग्रामस्तदा प्रभु:।।दिवं च पृथिवीं चैव निरीक्ष्य च दिशो दश।स्वातंत्र्यादुपसंहर्त्तु भुवनान्युपचक्रमे।।बन्धको भवपाशेन भवपाशात्प्रमोचकः।कैवल्यदः परब्रह्म विष्णुरेव सनातनः।।
उनके इस भाव से उत्पन्न महाप्रलय के संकट से मुक्ति के लिए ब्रह्मा, विष्णु, शिव और अन्यान्य देवता उनकी स्तुति करते हैं। भगवान विष्णु उनकी स्तुति करते हुए कहते हैं:
यदैकमात्मानमनेकधैव विभज्य विश्वं व्यतनोरमूर्ते ।
तदैवभानोवि रश्मयोऽमी त्वत्तोवयं रामविनिस्सृता हि॥
(अर्थात्) आदिकाल में चराचर सृष्टि का विस्तार करने के लिए जब आप अपने एक रूप से अनेक रूपों में विभक्त हो रहे होते हैं, उस समय हमलोग आपसे उसी तरह प्रकट होते हैं जैसे सूर्य से उसकी रश्मियाँ।
उनकी स्तुति से प्रसन्न भगवान राम विराटरूप का संवरण कर अपने मूल स्वरूप में वापस आते हैं।
निष्कर्ष: विराट और विश्वरूप के प्रवर्तक और निवर्तक स्वयं राम
विराट रूप के प्रवर्तक और निवर्तक भगवान श्रीराम ही हैं। अन्यान्य रूप कालक्रम में श्रीराम की इच्छा से ही विराटरूप धारण करते हैं। यह सिद्ध करता है कि परात्पर भगवान राम ही समस्त रूपों के मूल हैं, और उनकी इच्छा से ही सृष्टि का विस्तार और संहार होता है, और उन्हीं से विभिन्न अवतारों के विराट स्वरूप भी प्रकट होते हैं, जैसा कि स्कन्द पुराण की रामगीता में वर्णित है।
यह उद्धरण स्कन्द पुराण के निर्वाणखंड में वर्णित रामगीता से साभार प्रस्तुत है।
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