रामायण में वेदोक्त काल सूक्त का उपबृंहण: श्रीराम का महाकाल स्वरूप


श्रीराम का महाकाल स्वरूप – राम रहस्य दर्शन की हमारी गहन यात्रा में, हमने देखा कि कैसे वाल्मीकि रामायण और अन्य शास्त्र वेदों के गूढ़ रहस्यों को सरल कथाओं और दिव्य चरित्रों के माध्यम से उद्घाटित करते हैं। यहाँ हमें ‘उपबृंहण’ की अवधारणा को समझना आवश्यक है। संस्कृत में ‘उपबृंहण’ का अर्थ है किसी गूढ़ या संक्षिप्त विषय को विस्तार देना, पुष्ट करना या स्पष्ट करना, विशेषकर वेद जैसे गहन ग्रंथों के संदर्भ में। आज हम एक और अद्भुत रहस्य को समझेंगे: रामायण किस प्रकार वेदों में वर्णित ‘काल सूक्त’ का उपबृंहण करती है और भगवान श्रीराम के महाकाल स्वरूप का निरूपण करती है? यह हमें बताता है कि कैसे भगवान राम मात्र एक अवतार नहीं, बल्कि स्वयं काल के भी नियामक, उससे परे की सत्ता हैं।

श्रीराम का महाकाल स्वरूप - Bhagwan Shri Ram depicted as a divine embodiment of compassion, with gentle eyes radiating grace even in his fierce Mahakaal form, holding a bow yet exuding serenity (Copilot generated).
Copilot generated — “श्रीराम का महाकाल स्वरूप करुणा का आगार है”

श्रीराम का महाकाल स्वरूप: सृष्टि के नियंता और काल के प्रत्यक्षदर्शी

रामायण में हमें ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं जो भगवान श्रीराम की दिव्यता और उनके असीम सामर्थ्य को दर्शाते हैं। लंका में, जब परम भक्त हनुमानजी रावण को भगवान श्रीराम का यथार्थ बताते हैं, तो वे उनके सर्वसमर्थ स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं:

सर्वान्लोकान् सुसंहृत्य सभूतान् सचराचरान्। पुनरेव तथा स्रष्टुं शक्तो रामो महायशाः॥ (वाल्मीकि रामायण 5.51.39)

(अर्थात्) महायशस्वी श्रीराम जड़-चेतन सहित सभी लोकों का (प्रलयकाल में) भली-भाँति संहार करके, पुनः उनका (सृष्टि के आरंभ में) उसी प्रकार सृजन कर सृष्टि को यथावत अवस्था में लाने में समर्थ हैं।

यह श्लोक साधारणतया भगवान श्रीराम को त्रिदेवों की त्रिविध शक्ति (सृजन, पालन एवं संहार) से युक्त बताने का प्रयास लगता है। किन्तु ऐसा करने के लिए, त्रिदेवों की शक्ति के अतिरिक्त, अनन्त काल से चल रही इस सृष्टि में कालान्तर में जो भी घटा है, उसका प्रत्यक्षदर्शी होना अनिवार्य है। इस अनन्त काल वाली सृष्टि का ऐसा प्रत्यक्ष दर्शन करने वाले, सृष्टि से परे परात्पर भगवान श्रीराम ही हैं। वे ऐसे प्रभुओं के प्रभु हैं जो इस सृष्टि को बाहर से देख रहे होते हैं, फिर भी यहाँ सबकुछ उनके इशारे पर घटित हो रहा होता है। वे सब कुछ जानते हैं, पर उन्हें कोई नहीं जानता। वे स्वयं काल की सीमा में नहीं हैं, बल्कि काल भी उन्हीं के अधीन है।

इस बात की पुष्टि गोस्वामी तुलसीदास जी की अमरवाणी में भी मिलती है, जहाँ वे भगवान राम के इस अद्वितीय और अप्रमेय स्वरूप का वर्णन करते हैं:

जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संंभु नचावनिहारे॥ तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा॥ (श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड)

(अर्थात्) सारा जगत् तुम्हारा देखा हुआ है और तुम इस जगत् को देखने वाले हो। तुम ब्रह्मा, विष्णु और शिव को भी नचाने वाले हो (अर्थात उन्हीं से सृष्टि, स्थिति और संहार करवाते हो)। वे (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) भी तुम्हारे रहस्य को नहीं जानते, फिर और कोई तुम्हें जानने वाला कौन है?

भगवान राम के इसी सर्वव्यापी और सर्वसाक्षी स्वरूप का एक और अद्भुत प्रमाण तुलसीदास जी की चौपाई में मिलता है, जब भगवान राम वनवास के दौरान निवास स्थान के विषय में महर्षि वाल्मीकि से पूछते हैं, तो उनके सर्वव्यापी स्वरूप को भली-भाँति जानते हुए, महर्षि वाल्मीकि अत्यंत विनय और गूढ़ता से उत्तर देते हैं:

पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ। जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ।। (श्रीरामचरितमानस, सुंदरकाण्ड)

(अर्थात्) हे भगवान! आपने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ रहूँ, किंतु मैं आपसे पूछते हुए संकोच कर रहा हूँ। आप पहले मुझे वह जगह बता दें जहाँ आप नहीं हैं, तब मैं तुम्हें आपको आपके रहने योग्य स्थान दिखाऊँगाबताऊँ।

यह चौपाई स्पष्ट करती है कि भगवान राम वह परम सत्ता हैं जो स्वयं काल के प्रभाव से परे हैं और सभी त्रिदेवों के भी नियंता हैं, जो उनके महाकाल स्वरूप को प्रत्यक्ष दर्शाती है। वे दृष्टा हैं, जबकि समस्त सृष्टि और उसके भीतर का काल उनके इशारे पर कार्य करते हैं।

श्रीराम का महाकाल स्वरूप: वेदों का काल सूक्त और रामायण में उपबृंहण

वेदों ने परमेश्वर के निरूपण में ‘काल सूक्त’ कहा है, जिसमें काल को ही परम सत्ता के एक रूप के रूप में वर्णित किया गया है। यह सूक्त बताता है कि किस प्रकार काल ही सब कुछ का सृजन, पोषण और संहार करता है। रामायण, इसी वैदिक ‘काल सूक्त’ का उपबृंहण कर, श्रीराम के उस स्वरूप का निरूपण करती है जो स्वयं काल से परे है अर्थात् उनका ‘महाकाल स्वरूप’ है। रामायण हमें बताती है कि जो काल वेदों में एक शक्ति के रूप में वर्णित है, उस काल के भी अधिपति और नियंता स्वयं भगवान श्रीराम हैं।


निष्कर्ष: श्रीराम ही महाकाल और कालातीत सत्ता

इस प्रकार, रामायण हमें केवल एक मर्यादा पुरुषोत्तम की कथा नहीं सुनाती, बल्कि वेदों के गहनतम रहस्यों को भी उद्घाटित करती है। यह हमें सिखाती है कि भगवान श्रीराम ही वह परम सत्ता हैं जो काल से परे हैं, सभी घटनाओं के साक्षी हैं, और समस्त सृष्टि के नियंता हैं – स्वयं महाकाल स्वरूप हैं। रामायण में वर्णित ये प्रसंग और श्लोक, वेदों के ‘काल सूक्त’ के अर्थ को विस्तृत कर, श्रीराम के इस कालातीत और सर्वव्यापी स्वरूप (श्रीराम का महाकाल स्वरूप) का प्रत्यक्ष बोध कराते हैं।


यह उद्धरण वाल्मीकि रामायण (5.51.39) और श्रीरामचरितमानस (बालकाण्ड, सुंदरकाण्ड) से साभार प्रस्तुत है।


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