स्कन्द पुराण का राम रहस्य दर्शन – 1: राम ही त्रिमूर्ति, राम ही सर्वस्व, राम ही सार


स्कन्द पुराण का राम – रावण वध के उपरान्त भगवान राम की उपसंहार लीला का एक ऐसा अलौकिक दृश्य है, जहाँ सृष्टि के मूल रहस्य का उद्घाटन होता है। यह घटना केवल एक दिव्य साक्षात्कार नहीं, बल्कि राम रहस्य दर्शन का एक गहरा अध्याय है, जो हमें समझाता है कि किस प्रकार ‘सब राम में रमते हैं और राम सब में रमते हैं।’ आइए, स्कन्द पुराण का राम रहस्य जो निर्वाणखंड में छिपा है और जिसे रामगीता भी कहते हैं, उस परम सत्य की यात्रा करें, जहाँ स्वयं त्रिदेव भगवान राम के विराट स्वरूप का गुणगान करते हुए उनकी वास्तविक पहचान को उजागर करते हैं।

स्कन्द पुराण का राम - A Copilot generated celestial scene showing Lord Ram in his serene human form, surrounded by a reverent assembly of Devas led by Lord Shiva, against a radiant golden sky.
A Copilot-generated depiction of a divine gathering where Lord Shiva and other celestial beings offer homage to Lord Ram, symbolizing his supreme divinity.

स्कन्द पुराण का राम: भगवान शिव का परम उद्घोष, राम ही विराट स्वरूप और त्रिदेवों का आधार

रावण वध के बाद, प्रभु श्रीराम ने अपनी उपसंहार लीला से देवताओं को साक्षात्कार कराने की इच्छा से कल्पान्त के समय धारण किए जाने वाले अपने विराट स्वरूप में पदार्पण किया। उनके इस रूप की प्रचण्डता इतनी अधिक थी कि प्रलय की तरफ़ उन्मुख हो रही सृष्टि की रक्षा हेतु ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित अन्य सभी देवता उनके सम्मुख उपस्थित होकर स्तुति करने लगे।

इसी स्तुति क्रम में, भगवान शिव ने परब्रह्म राम की वास्तविक पहचान का एक अद्भुत रहस्य उजागर किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्कन्द पुराण का राम रहस्य यह है कि राम ही त्रिमूर्ति हैं – वे ही ब्रह्मा, विष्णु, और महेश के मूल आधार हैं।

भगवान शिव ने कहा:

मुख्यत्वाद्‌ विश्वबीजत्वात्‌ तारकत्वान्महेश्वरः । 
त्वदंशैः स्वीकृतं देवैरस्माभिर्नाम ते त्रिभिः।।
भार्गवोऽयं पुरा भूत्वा स्वीकृतं नाम ते विधिः ।
विष्णुर्दाशरथिर्भूत्वा स्वीकरोत्यधुना पुनः॥
संकर्षणश्च तच्चाहं स्वीकरिष्यामि शाश्वतम्‌ ।
एकमेव त्रिधोपात्तं सृष्टिस्थित्यन्तहेतवे॥
भ्रातरस्ते त्रयो राम ब्रह्मा विष्णुरहं तथा ।
त्वत्तो विनिर्गता भूयो वयं लीयेमहि त्वयि ॥
(स्कन्द पुराण, निर्वाणखंड, रामगीता)

अर्थात: “हे महेश्वर श्रीराम! सर्वप्रधान, विश्व का बीज और तारक होने के कारण, आपके ही अंशभूत हम तीनों (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) देवताओं ने आपके राम नाम को स्वीकार किया है। ब्रह्माजी पहले ही भृगुवंश में उत्पन्न होकर (परशुराम अवतार के समय) आपके राम नाम को स्वीकार कर चुके हैं। तदनन्तर इस समय भगवान विष्णु स्वयं दशरथनंदन राम रूप होकर राम नाम स्वीकार रहे हैं। आगे चलकर मैं भी आपका सनातन संकर्षण रूप धारण कर (अर्थात् बलराम बनकर) राम नाम को स्वीकार करूँगा। हे प्रभु! इस तरह केवल एक आपका ही नाम उत्पत्ति, पालन और संहार के लिये तीन प्रकार से स्वीकार किया गया है। हे प्रभु! आपके तीनों भाई (भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न) और कोई नहीं बल्कि विष्णु, मैं और ब्रह्माजी ही हैं अर्थात् हम तीनों आपके ही स्वरूप हैं। हम सब आपसे ही प्रकट हुए हैं और पुनः आप में ही लीन हो जाएँगे।”

और इसी क्रम में भगवान शिव एक और परम सत्य का उद्घोष करते हैं:

सर्वे अवतारा श्री राम नाम शक्ति समुद्भवाः | [स्कन्द-पुराण] (अर्थ: भगवान हरि के सभी अवतार श्री राम नाम की शक्ति से उत्पन्न होते हैं।)

स्कन्द पुराण का राम, समन्वय का परम सूत्र: सब राम में रमते हैं, राम सब में रमते हैं

यह भगवान शिव द्वारा किया गया परम उद्घोष है, जो राम रहस्य दर्शन के केंद्रीय सूत्र “सब राम में रमते हैं और राम सब में रमते हैं” को प्रत्यक्षतः प्रमाणित करता है। यह स्पष्ट करता है कि रामनाम ही सृष्टि का एकमात्र आधार है; ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी राम के ही अंश हैं और उनके नाम तथा शक्ति से ही अपने कार्य (सृष्टि, स्थिति, संहार) करते हैं। भगवान राम ही वह मूल स्रोत हैं जिससे त्रिदेव प्रकट होते हैं और अंततः उसी में विलीन हो जाते हैं। राम की इच्छा ही इस सम्पूर्ण जगत के होने का एकमात्र कारण है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी राम नाम की इसी अमोघ शक्ति का गुणगान करते हुए कहा है:

“कलिजुग केवल नाम अधारा। सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा॥” (कलयुग में केवल नाम ही आधार है। नाम का स्मरण करके मनुष्य भवसागर से पार उतर जाते हैं।)


निष्कर्ष: सर्वसाक्षी राम का अनादि स्वरूप

यह राम रहस्य दर्शन हमें सिखाता है कि भगवान राम जो श्रेष्ठतम अवतार हैं वही परब्रह्म भी हैं, और वही अवतारी पुरुष स्वयं अवतार लेकर नाना भाँति की लीलाएँ भी करते हैं। वे हर कण में व्याप्त हैं और जिनसे सब कुछ उद्भूत होता है। उनका उद्देश्य कभी खत्म नहीं होता। स्कन्द पुराण का राम रहस्य यह दिव्य प्रमाण हमारी इस अवधारणा को दृढ़ता से स्थापित करता है:

स्थितं रामे जगत्सर्वं रामः सर्वेषु संस्थितः


यह उद्धरण उपासनात्रयसिद्धान्त और कल्याण के राम वचनामृत अंक से साभार प्रस्तुत है।


Related Articles

जय सियाराम 🙏🙏