विष्णु कृत स्तुति रामगीता – हमने अपने पिछले लेख “स्कन्द पुराण का राम रहस्य दर्शन – 1: राम ही त्रिमूर्ति, राम ही सर्वस्व, राम ही सार” में देखा कि कैसे स्कन्द पुराण का राम रहस्य स्वयं भगवान शिव ने उजागर किया, यह बताते हुए कि परात्पर भगवान राम ही समस्त त्रिदेवों के मूल आधार हैं। इसी श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए, स्कन्द पुराण के निर्वाणखंड में वर्णित रामगीता हमें एक और अद्भुत राम रहस्य दर्शन कराती है – जहाँ स्वयं भगवान विष्णु द्वारा परब्रह्म राम की स्तुति की गई है।
यह स्तुति स्वयं भगवान विष्णु के मुख से निकली है, जो परब्रह्म राम के सर्वोच्च और सर्वव्यापी स्वरूप का गुणगान करती है। यह केवल राम की महिमा का बखान नहीं करती, बल्कि यह भी स्पष्ट करती है कि राम ही समस्त सृष्टि के मूल हैं – वही ब्रह्मा, विष्णु और महेश के भी आधार हैं। यह रामगीता स्कन्द पुराण के गहन दर्शन को दर्शाता है, जहाँ विष्णु स्वयं को राम का हृदय, ब्रह्मा को राम की नाभि और शिव को राम का कंठ बताते हैं।
श्रीविष्णुरुवाच:नमो रामाय विभवे तुभ्यं विश्वैकसाक्षिणे ।नमो विश्वैकदेहाय नमो विश्वातिगाय ते ॥नमो नित्याय शुद्धाय प्रभवे कालमूर्त्तये ।दशदिग्बाहवे तुभ्यं नमो भूचरणाय च ॥नमोऽम्भोरेतसेशश्वत्तेजोनेत्राय ते नमः ।वायुचेष्टाय महते व्योमदेहाय ते नमः ॥अहं ते हृदयं राम तव नाभिः पितामहः ।कण्ठस्ते नीलकण्ठोऽसौ भ्रूमध्यं च दिवेश्वरः ॥सदाशिवो ललाटस्ते तत ऊर्ध्वे परः शिवः ।भूषणानि च तत्त्वानि विश्वाकारस्य ते प्रभो ॥
(स्कन्द पुराण, निर्वाणखंड, रामगीता)
अर्थात्: विष्णु भगवान कहते हैं– हे राम! आप सर्वव्यापक तथा विश्व के एकमात्र साक्षी हैं, ऐसे आपको नमस्कार है। विश्व एकमात्र आपका ही शरीर है तथा आप विश्व से भी परे हैं, आपको बारंबार प्रणाम है। नित्य, शुद्ध, सर्वसमर्थ, कालस्वरूप आपको अभिवादन है। दसों दिशाएँ जिनकी भुजाएँ हैं, पृथ्वी जिनका चरण है, ऐसे आपको नमस्कार है। जल जिनका वीर्य है, सनातन तेज जिनके नेत्र हैं, वायु जिनकी चेष्ठा है और आकाश जिनका शरीर है, उन परमपुरुष का बारम्बार अभिवादन है। श्रीराम ! मै आपका हृदय हूँ। पितामह बह्मा आपकी नाभि हैं। ये नीलकण्ठ महादेव आपके कण्ठस्थानीय हैं। आपकी भौहों के मध्यभाग सूर्य हैं। सदाशिव आपके ललाट हैं और उसके ऊपर के भाग परात्पर शिव हैं। हे प्रभो ! सारे तत्त्व आपके विश्वरूप के ही आमूषण हैं।
विष्णु कृत स्तुति रामगीता का निष्कर्ष: राम ही सबका आधार
यह विष्णु कृत स्तुति रामगीता का अंश है और स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि कैसे परात्पर भगवान राम स्वयं भगवान विष्णु सहित सभी देवों और समस्त सृष्टि के मूल आधार हैं। राम ही वह अंतिम सत्य हैं, जिनसे सब कुछ प्रकट होता है और जिनमें सब लीन हो जाता है। इसी विचार को पुष्ट करते हुए, भगवान विष्णु आगे कहते हैं:
श्लोक:यदैकमात्मानमनेकधैव विभज्य विश्वं व्यतनोरमूर्ते ।तदैव भानोवि रश्मयोऽमी त्वत्तो वयं राम विनिस्सृता हि ॥
अर्थात्: हे निराकार परात्पर भगवान राम! जिस क्षण आपने अपने अद्वितीय कूटस्थ स्वरूप को अनेक रूपों में विभक्त करके इस सम्पूर्ण विश्व का विस्तार किया, उसी क्षण से हम — ये सूर्य की किरणें — आपसे ही उत्पन्न होकर आप में ही स्थित हैं।
भाव संकेत: यह श्लोक भगवान राम के निर्गुण-निराकार ब्रह्म स्वरूप को उद्घाटित करता है। यह बताता है कि जगत् में जो भी प्रकाश, ऊर्जा या जीवन का संचार है — वह सब राम से ही निःसृत (निकला हुआ) है। सूर्य की किरणें ही नहीं, सम्पूर्ण सृष्टि उसी परमात्मा के विभाजित अंश हैं।
विष्णु कृत स्तुति रामगीता का यह उद्धरण उपासनात्रयसिद्धान्त और कल्याण के राम वचनामृत अंक से साभार प्रस्तुत है।
Related Articles
- 🔗 The Ram Rahasya Equation: Ram’s Experiment and the Science of Reality
- 🔗 Amogh Stuti: The First Divine Praise of Ram after Victory
- 🔗 The Ram Rahasya Darshan: Unveiling the Paratpar Swaroop of SitaRam
- 🔗 परात्पर भगवान राम
- 🔗 स्कन्द पुराण का राम रहस्य दर्शन – 1: राम ही त्रिमूर्ति, राम ही सर्वस्व, राम ही सार
जय सियाराम 🙏🙏