रामायण वेदोपबृंहणार्थाय – राम रहस्य दर्शन की इस अद्भुत यात्रा में, हमने अब तक भगवान श्रीराम के परब्रह्म स्वरूप, उनके विराट रूप और उनके आत्मस्वरूप की गहनता को समझा है। आज हम एक ऐसे विषय पर विचार करेंगे जो रामचरित की अद्वितीयता को और भी स्पष्ट करता है: रामायण किस प्रकार वेदों में वर्णित पुरुष सूक्त और श्री सूक्त का उपवृंहन करती है? यह समझना आवश्यक है कि किस प्रकार वेद स्वयं साक्षात् ब्रह्ममय हरि श्रीराम का गुणगान करते हैं, और किस प्रकार रामायण उन्हीं वैदिक रहस्यों को विस्तार देती है।

वेदों का “नेति-नेति” वर्णन और श्रीराम का अनंत स्वरूप
वेदों के सभी सूक्त, गहरे ध्यान और साक्षात्कार के माध्यम से, श्रीराम के परम स्वरूप को देखते हुए उनके लिए ही रचे गए हैं। उनके दुर्धर्ष विग्रह (अद्भुत स्वरूप) के भीतर वेदों ने प्रभु के विभिन्न स्वरूपों को जिस प्रकार देखा, उसी के अनुरूप सूक्तों की रचना की। प्रभु के ब्रह्म स्वरूप, सनातन पुरुष और श्री का वेदों ने क्रमशः पुरुष सूक्त और श्री सूक्त के माध्यम से निरूपण किया है।
जब प्रभु के विग्रह में वेदों को एक के बाद दूसरा रूप दृष्टिगोचर होता, वेद पूर्व रूप के निरूपण को “नेति-नेति” कहकर उसका निषेध कर, दूसरे रूप का निरूपण करने लगते। वेदों ने प्रभु के भीतर अनंत रूपों को देखते हुए, उन सभी देवताओं (पुरुष, श्री, काल, रुद्र, इंद्र, सूर्य आदि) का एक-एक कर सूक्तों द्वारा गुणगान किया और उनके लिए विशेष मंत्र रचे। इसी तरह, प्रभु के अनेक स्वरूपों का वेदों ने नेति-नेति कहकर वर्णन किया। यद्यपि वेद प्रभु के विराट स्वरूप वाले पुरुष, श्री और अन्य स्वरूपों को देख रहे थे और उनके सभी सूक्त अंततः केवल श्रीराम के लिए ही समर्पित थे, फिर भी वे प्रभु के अनंत रूपों के निरूपण में उनके उस संपूर्ण दुर्धर्ष स्वरूप का पार नहीं पा सके। प्रभु का स्वरूप इतना विशाल और असीम है कि उसे किसी भी शब्द या अवधारणा में पूरी तरह से बांधा नहीं जा सकता। और यही कारण था कि वेदों ने स्वयं को विस्तृत करने की इच्छा की और रामायण के रूप में अवतरित होकर प्रभु के इस अवर्णनीय स्वरूप का पूर्ण निरूपण किया।
रामायण वेदोपबृंहणार्थाय: रामायण वेदों का उपवृंहण करने वाला ग्रंथ
जब प्रभु श्रीराम का अवतार अयोध्या में हुआ, वेदों ने स्वयं रामायण के रूप में अवतार लेकर प्रभु के निरूपण का उपवृंहण किया। ‘उपवृंहण’ का अर्थ है किसी बात को उदाहरणों, कथाओं या विस्तार से पुष्ट करना। इसी कारण, रामायण वेदोपबृंहणार्थाय अर्थात् वेदों का उपवृंहित (विस्तारपूर्वक व्याख्या) करने वाला ग्रंथ कहा गया। रामायण केवल राम की कथा नहीं, बल्कि वेदों के गूढ़ रहस्यों का व्यावहारिक और अनुकरणीय प्रकटीकरण है।
रामायण में पुरुष सूक्त और श्री सूक्त को एकसाथ समाहित करते हुए पुरुषशिरोमणि श्रीराम और मूलप्रकृति भगवती सीता का निरूपण किया गया है। यहाँ उन्हें सर्वोत्कृष्ट गुणों से युक्त बताया गया है:
- सूर्य का भी सूर्य (प्रकाश के भी प्रकाशक)
- अग्नि का भी अग्नि (तेज के भी स्रोत)
- प्रभु का भी प्रभु (सभी स्वामियों के परम स्वामी)
- श्री का भी श्री (समस्त ऐश्वर्य की भी मूल)
- कीर्ति का भी कीर्ति (समस्त यश की भी आधार)
- क्षमा का भी क्षमा (समस्त सहनशीलता की भी पराकाष्ठा)
- देवताओं का भी देवता (सभी देवों के आराध्य)
- सभी भूतों में उत्तम भूत (समस्त प्राणियों में श्रेष्ठतम सत्ता)
रामायण वेदोपबृंहणार्थाय का प्रमाण: सीता जी का श्री का श्री होना
जब ऐसे प्रभु श्रीराम, भगवती सीता के साथ राज्याभिषेक के अवसर पर सिंहासन पर विराजमान होते हैं, वहाँ लक्ष्मी देवी और भू देवी के रूप में सीता जी का श्री का भी श्री होना भी प्रमाणित होता है। यह दर्शाता है कि सीता जी केवल लक्ष्मी का एक रूप नहीं, बल्कि समस्त ऐश्वर्य और पृथ्वी तत्व की मूल स्रोत हैं। इस आशय की पुष्टि अयोध्या कांड के निम्नलिखित श्लोकों से होती है:
सूर्यस्यापि भवेत्सूर्यो ह्यग्नेरग्नि प्रभोः प्रभुः। श्रियः श्रीश्च भवेदग्र्या कीर्तिः कीर्त्याः क्षमाक्षमा।। दैवतं दैवतानां च भूतानां भूतसत्तमः। तस्य के ह्यगुणा देवि वने वाप्यथवा पुरे।। पृथिव्या सह वैदेह्या श्रिया च पुरुषर्षभः। क्षिप्रं तिसृभिरेताभि स्सह रामोऽभिषेक्ष्यते।। (वाल्मीकि रामायण 2.44.15-17)
(अर्थात्) (राम) सूर्य के भी सूर्य हैं, अग्नि के भी अग्नि हैं, प्रभुओं के भी प्रभु हैं। वे श्री (लक्ष्मी) की भी श्री, कीर्ति की भी कीर्ति, और क्षमा की भी क्षमा हैं। वे देवताओं के भी देवता हैं और सभी प्राणियों में सबसे उत्तम प्राणी हैं। हे देवी! ऐसे राम में वन में या नगर में कौन से अवगुण हो सकते हैं? (सुमित्रा जी आगे कहती हैं) पुरुषश्रेष्ठ राम का शीघ्र ही पृथिवी (भू देवी) के साथ वैदेही (सीता जी) के रूप में और श्री (लक्ष्मी देवी) के साथ इन तीनों के साथ अभिषेक किया जाएगा।
भगवती सीता के इस परम स्वरूप की पुष्टि एक अन्य महत्वपूर्ण श्लोक से भी होती है:
वसुधाया हि वसुधां श्रियः श्रीं भर्तृवत्सलाम् । सीतां सर्वानवद्याङ्गीमरण्ये विजने शुभाम् ॥ (वाल्मीकि रामायण 6.111.24)
अर्थ: “भगवती सीता पृथ्वी की भी पृथ्वी हैं (अर्थात भू-देवी की भी देवी हैं), और भगवती श्री की भी श्री हैं (अर्थात मूल श्री-देवी हैं; ‘श्रियः श्रीं’ का अर्थ है कि सीता स्वयं ही मूल दिव्यता हैं, उन सभी देवियों का मूल स्रोत हैं जिन्हें श्री कहा जा सकता है जैसे भगवती लक्ष्मी, भगवती राधा आदि और उनकी अनगिनत अभिव्यक्तियाँ)।”
प्रभु श्रीराम की नित्य लीला में उनके सहायकगण अनेक भावों से उनके साथ रहते हैं। उनके दुर्धर्ष स्वरूप के निरूपण में इन सहायकगणों की भूमिका अतुलनीय होती है। अयोध्या कांड के उपर्युक्त श्लोक (2.44.15-17) वात्सल्य भाव से ओतप्रोत माता सुमित्रा के श्रीमुख से कहे गए हैं, जो उनके पुत्र प्रेम के साथ-साथ श्रीराम के परम स्वरूप के प्रति उनके गहन बोध को भी दर्शाते हैं।
निष्कर्ष: श्रीराम और सीता में वेदों का साक्षात प्रकटीकरण
इस प्रकार, रामायण केवल एक काव्य नहीं, बल्कि वेदों का ही मूर्त स्वरूप है, जो भगवान राम और भगवती सीता के माध्यम से पुरुष सूक्त और श्री सूक्त के परम रहस्यों को सरलता से उद्घाटित करती है। यह हमें सिखाती है कि वेद जिस परम सत्ता का अमूर्त वर्णन करते हैं, वही साक्षात् राम और सीता के रूप में इस पृथ्वी पर अवतरित हुए। रामायण का प्रत्येक प्रसंग हमें उस परब्रह्म राम और मूलप्रकृति सीता के दिव्य गुणों और असीम महिमा का प्रत्यक्ष अनुभव कराता है, जिससे वेदों का ज्ञान हमारे जीवन में चरितार्थ होता है।
यह उद्धरण वाल्मीकि रामायण (अयोध्या कांड 2.44.15-17 और 6.111.24) से साभार प्रस्तुत है।
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